नानी का जाना...बहुत कुछ टूट जाना
बहराईच अपने माता-पिता से मिलने का मलतब नाना-नानी के घर जाना भी है। बहराईच में सुबह तैयार होकर बाइक निकाली...अनमने तरीके से किक मारी..70 एमएम की एक पूरी 35 साला खामोश पिक्चर मेरे दीमाग में चल रही थी। मेरी बाइक काजीपुर मोहल्ले की संकरी गलियों में दाखिल हुई..पर जेहन इन पुरानी यादों के साथ मोहल्ले की इन गलियों में उस बचपने को भी खोज रहा था जो हर एक दरो-दीवार..जानें-पहचाने घरों के पलस्तर और चूने-सफेदी की पुरानी यादों में कहीं जुड़ा मिला तो कहीं उजड़ा मिल रहा था। मेरी बाइक गली के किनारे पर रुक गई..घर के ऊपर शांति भवन लिखा था दरवाजे पर धर्मदत्त पांडेय का पुराना बोर्ड लगा था।
दरवाजा खटखटाते ही वो अपने आप खुल गया। मैं बैठका के खुले दरवाजे से अंदर दाखिल हुआ...घर में अजीब सन्नाटा पसरा था..गौरय्या की आवाज जब तक इस सन्नाटे को तोड़ देती थी..बैठका से सटे कमरे में नीम अंधेरा छाया हुआ था...बेड पर बिना सिलवट की एक चादर करीने से बिछी थी,
बेड के सिरहाने की हमेशा बंद रहने वाली खिड़की का थोड़ा हिस्सा आज खुला हुआ था। उससे छनकर आने वाली आड़ी-तिरछी धूप मानो इस नीम अंधेरे को बीच से चीर दे रही हो। मेरी आंखे डबडबाने लगी थी इसी बेड पर आमतौर पर लेटी रहने वाली मेरी नानी..अक्सर मेरे आने की आहट पर जाग कर कहती...भय्या रवीश..दिल्ली से कब आए...चलो बैठो...मैं आती हूं। ये कहकर वो अपनी धोती का पल्लू सिर पर रखकर मेरे साथ उस कमरे से बाहर बरामदे तक आ जाती थी। उसी अनजानी आदत ने मुझे इस कमरे में रोक कुछ देर के लिए रोक सा लिया था। नानी के कमरे से बाहर निकल कर बरामदे में आ गया..वहां एक खाली पड़ी कुर्सी थी जिसपर अक्सर मेरी नानी बैठा करती थी..लेकिन मेरे आते ही वो उस कुर्सी पर मुझे बैठाकर खुद फर्श पर बैठ जाया करती थी। कुर्सी खाली थी..उसी से कुछ दूरी पर नीचे पानदान रखा था जिसमें रखे छोटे से सरौते पर नजर रुक गई। कई बार सरौते से डली काटते हुए वो मुझसे कहती थी..भय्या समय बड़ा बलवान होता है..उससे किसी ने मुकाबला करने की कोशिश कि वो खत्म हो गया...बातचीत करते हुए...वो बहू यानि मेरी मामी को बुलाती..एक सांस में कह जाती ...देखो भय्या आए हैं पहले चाय पिलाओ..फिर खाना खिलाओ...फिर मुझे देखते हुए बोलती...और भय्या दुलहन कैसी है...अचानक मेरी नजर पानदान से होते हुए बरामदे में लगी लाइट के स्विचबोर्ड पर चली गई...स्विचबोर्ड पर लगे एक छोटे से खरगोश के स्टिकर को देखकर आंखे और नम हो गई..25 साल पहले खराब हो चुके खिलौने से इस स्टिकर को निकालकर मैंने ही इस बोर्ड पर चिपका दिया था...जिससे जुड़ी यादें आज भी जेहन की किताब में भूली एक चिट जैसी चिपकी हुई है...तभी अचानक पीछे से मामी आई..अरे भय्या तुम कब आए...बैठका का दरवाजा खुला था क्या...मैंने बिना जवाब दिए..रुमाल निकाला और डबडबाई आंखों को फिर
पोंछा..चश्मा ठीक किया और नानी की कुर्सी पर बैठ गया..पानदान के पास नीचे फर्श पर मामी बैठ गई..वो कुछ थकी और बीमार सी लग रही थी..सिर नीचे करके धीरे से बोली...फिर भर्राई आवाज में बोलती ही चली गई...जैसे वो खुद से बात कर रही हो या उस पानदान को सुना रही हों.....भय्या नानी के मरने की खबर मिल गई थी..? दीपावली की छुट्टी पर जब तुम बहराईच से दिल्ली गए थे..उसी के हफ्ते भर बाद उनकी मौत हो गई थी..हम सब इसलिए तुम्हें खबर नहीं किए..कि तुम्हें इतनी जल्दी-जल्दी छुट्टी कहां मिलेगी...प्राइवेट नौकरी में हो..बेकार परेशान होगे...मैं एक टक आंगन में दाना चुग रही गौरय्या को देख रहा था...उसके शोर में मामी की आगे की बातें मानो गुम सी हो गई थी..आंखों के किनारे से पानी की एक धार गाल से होती हुई मेरी कलाई पर गिरी। नाना-नानी की अनगिनत यादें पुरानी बातें एक के बाद एक मेरे दिमाग में चल रही थी...सिर भारी हो रहा था..मैं तेजी से उठा और नानी के कमरे से होते हुए बैठका से बाहर निकल गया..बाइक पर किक मारी और काजीपुरा की उन उधेड़बुन वाली गलियों में गायब हो गया...
पौ फटने वाली थी...सूरज निकलने से पहले आसमान लाल हो चुका था। जागते हुए पत्नी बाहर छत पर आई..बोली अरे रात से यहीं बैठो हो...क्या हुआ। मैं बिना जवाब दिए बाथरूम में घुस गया और आंखे बंद करके जोर जोर से रोने लगा....
बहराईच अपने माता-पिता से मिलने का मलतब नाना-नानी के घर जाना भी है। बहराईच में सुबह तैयार होकर बाइक निकाली...अनमने तरीके से किक मारी..70 एमएम की एक पूरी 35 साला खामोश पिक्चर मेरे दीमाग में चल रही थी। मेरी बाइक काजीपुर मोहल्ले की संकरी गलियों में दाखिल हुई..पर जेहन इन पुरानी यादों के साथ मोहल्ले की इन गलियों में उस बचपने को भी खोज रहा था जो हर एक दरो-दीवार..जानें-पहचाने घरों के पलस्तर और चूने-सफेदी की पुरानी यादों में कहीं जुड़ा मिला तो कहीं उजड़ा मिल रहा था। मेरी बाइक गली के किनारे पर रुक गई..घर के ऊपर शांति भवन लिखा था दरवाजे पर धर्मदत्त पांडेय का पुराना बोर्ड लगा था।
दरवाजा खटखटाते ही वो अपने आप खुल गया। मैं बैठका के खुले दरवाजे से अंदर दाखिल हुआ...घर में अजीब सन्नाटा पसरा था..गौरय्या की आवाज जब तक इस सन्नाटे को तोड़ देती थी..बैठका से सटे कमरे में नीम अंधेरा छाया हुआ था...बेड पर बिना सिलवट की एक चादर करीने से बिछी थी,
बेड के सिरहाने की हमेशा बंद रहने वाली खिड़की का थोड़ा हिस्सा आज खुला हुआ था। उससे छनकर आने वाली आड़ी-तिरछी धूप मानो इस नीम अंधेरे को बीच से चीर दे रही हो। मेरी आंखे डबडबाने लगी थी इसी बेड पर आमतौर पर लेटी रहने वाली मेरी नानी..अक्सर मेरे आने की आहट पर जाग कर कहती...भय्या रवीश..दिल्ली से कब आए...चलो बैठो...मैं आती हूं। ये कहकर वो अपनी धोती का पल्लू सिर पर रखकर मेरे साथ उस कमरे से बाहर बरामदे तक आ जाती थी। उसी अनजानी आदत ने मुझे इस कमरे में रोक कुछ देर के लिए रोक सा लिया था। नानी के कमरे से बाहर निकल कर बरामदे में आ गया..वहां एक खाली पड़ी कुर्सी थी जिसपर अक्सर मेरी नानी बैठा करती थी..लेकिन मेरे आते ही वो उस कुर्सी पर मुझे बैठाकर खुद फर्श पर बैठ जाया करती थी। कुर्सी खाली थी..उसी से कुछ दूरी पर नीचे पानदान रखा था जिसमें रखे छोटे से सरौते पर नजर रुक गई। कई बार सरौते से डली काटते हुए वो मुझसे कहती थी..भय्या समय बड़ा बलवान होता है..उससे किसी ने मुकाबला करने की कोशिश कि वो खत्म हो गया...बातचीत करते हुए...वो बहू यानि मेरी मामी को बुलाती..एक सांस में कह जाती ...देखो भय्या आए हैं पहले चाय पिलाओ..फिर खाना खिलाओ...फिर मुझे देखते हुए बोलती...और भय्या दुलहन कैसी है...अचानक मेरी नजर पानदान से होते हुए बरामदे में लगी लाइट के स्विचबोर्ड पर चली गई...स्विचबोर्ड पर लगे एक छोटे से खरगोश के स्टिकर को देखकर आंखे और नम हो गई..25 साल पहले खराब हो चुके खिलौने से इस स्टिकर को निकालकर मैंने ही इस बोर्ड पर चिपका दिया था...जिससे जुड़ी यादें आज भी जेहन की किताब में भूली एक चिट जैसी चिपकी हुई है...तभी अचानक पीछे से मामी आई..अरे भय्या तुम कब आए...बैठका का दरवाजा खुला था क्या...मैंने बिना जवाब दिए..रुमाल निकाला और डबडबाई आंखों को फिर
पोंछा..चश्मा ठीक किया और नानी की कुर्सी पर बैठ गया..पानदान के पास नीचे फर्श पर मामी बैठ गई..वो कुछ थकी और बीमार सी लग रही थी..सिर नीचे करके धीरे से बोली...फिर भर्राई आवाज में बोलती ही चली गई...जैसे वो खुद से बात कर रही हो या उस पानदान को सुना रही हों.....भय्या नानी के मरने की खबर मिल गई थी..? दीपावली की छुट्टी पर जब तुम बहराईच से दिल्ली गए थे..उसी के हफ्ते भर बाद उनकी मौत हो गई थी..हम सब इसलिए तुम्हें खबर नहीं किए..कि तुम्हें इतनी जल्दी-जल्दी छुट्टी कहां मिलेगी...प्राइवेट नौकरी में हो..बेकार परेशान होगे...मैं एक टक आंगन में दाना चुग रही गौरय्या को देख रहा था...उसके शोर में मामी की आगे की बातें मानो गुम सी हो गई थी..आंखों के किनारे से पानी की एक धार गाल से होती हुई मेरी कलाई पर गिरी। नाना-नानी की अनगिनत यादें पुरानी बातें एक के बाद एक मेरे दिमाग में चल रही थी...सिर भारी हो रहा था..मैं तेजी से उठा और नानी के कमरे से होते हुए बैठका से बाहर निकल गया..बाइक पर किक मारी और काजीपुरा की उन उधेड़बुन वाली गलियों में गायब हो गया...
पौ फटने वाली थी...सूरज निकलने से पहले आसमान लाल हो चुका था। जागते हुए पत्नी बाहर छत पर आई..बोली अरे रात से यहीं बैठो हो...क्या हुआ। मैं बिना जवाब दिए बाथरूम में घुस गया और आंखे बंद करके जोर जोर से रोने लगा....
