Thursday, 1 January 2015

ये हैं दुनिया के सबसे गरीब राष्ट्रपति

ये हैं दुनिया के सबसे गरीब राष्ट्रपति

उन्हें गरीब राष्ट्रपति के बजाए साधारण कहलाना ज्यादा पसंद है।
उनके पास दरम्याना कद, बेढोल शरीर, चेहरे पर साधारण लेकिन सरल मुस्कान है।
वो तेरह साल जेल में बिता चुके हैं। और अपनी तनख्वाह की 90 फीसदी रकम दान दे देते हैं।
ये दुनिया के सबसे गरीब और विनम्र उराग्वे के राष्ट्रपति जोश मजुका है। उनके बारे में किसी अखबार में पढ़ रहा था।
जितना पढ़ता गया मेरी दिलचस्पी उतनी उनके व्यक्तित्व को जानने की बढ़ती गई।
उनके पास 90 के दशक की एक छोटी फोक्सवैगन बीटल कार है। जिससे वो राष्ट्रपति कार्यालय जाते हैं।
मेरे मन में कभी उनकी छवि के आसपास अरविंद केजरीवाल या ममता बनर्जी की कार घूमती।
तो कभी अमेरीका में नरेंद्र मोदी का नींबू पानी पीना घूमता है।
मैं सोच रहा था क्या इस तरह की सादगी और गरीबी के आसपास भी हमारे कोई नेता फटकते हैं।
जवाब गांधी जी के आसपास घूम रहा था..हमारी पीढ़ी ने जब होश संभाला तो मुझे याद है
जब वीपी सिंह ने प्रधानमंत्री पद संभाला तो वीआईपी कारों के काफिले को कम किया।
जो अखबार की सुर्खियां बनी। यही खबर दिल्ली से करीब 600 किमी दूर जब मेरे शहर
बहराईच के घर में पहुंची तो मैंने अपने पिता के चेहरे पर एक संतोष का भाव देखा था।
जो शायद ये अहसास दिलाता था कि हमारा देश एक जिम्मेदार हाथों में है।
पता नहीं क्यों सादगी में मुझे सकारात्मकता दिखती है।
वक्त बीतता गया अब मीडिया में हमारे नेताओं की वीआईपी कारों और बड़े घर की चर्चा होती है या आलोचना।
खैर उराग्वे के राष्ट्रपति जोश मजुका के बारे में आपको जानकारी देने के बजाए हम अपने देश के नेताओं की चर्चा
करने लगे जो इन सुविधाओं को जरुरत बताकर लेते हैं फिर सादगी का ढोल पीटते हैं।
जोश मजुका जब पांच साल के थे तो उनके गरीब किसान पिता दिवालिया होकर मर गए।
बचपन संघर्ष में बीता और बाद में क्यूबा की क्रांति से प्रभावित होकर ब्राड फ्रंट नाम का एक संगठन खड़ा किया।
सरकार से गोरिल्ला युद्धा शुरू करने वाले जोश मजुका 1970 में गिरफ्तार कर लिया गया।
लेकिन गिरफ्तारी से पहले सेना से उनका संघर्ष हुआ और उन्हें छह गोली लगी।
एक साधारण से डाक्टर ने उऩकी जान बचाई। इसके बाद उन्हें जेल में डाल दिया गया।
जेल से भी भागने की उन्होंने कोशिश की। 90 के दशक में जब उराग्वे में लोकतंत्र आया तो
उन्हें आजाद किया गया।
जोश मजुका ने लुशिया नाम की एक महिला से शादी की। जो गोरिल्ला युद्ध के दौरान उनके साथ लड़ी थी।
आजकल लुशिया भी सिनेटर है। उनके कोई बच्चे नहीं है..12000 डॉलर की सैलरी का 90 फीसदी दान कर देते हैं।
अपने छोटे से फार्म हाउस में अपनी पत्नी और तीन पैरों वाले एक कुत्ते के साथ रहते हैं। फूल उगाकर बेचते है
यही उनकी आमदनी का जरिया है। हालांकि जोश मजुका खुशकिस्मत है कि केवल साढ़े तीन मिलियन लोगों के एक छोटे
से देश के राष्ट्रपति है। लेकिन उनकी परांपरा से व्यवहारिक नीति बनाने की सोच का मैं कायल हूं।
ऐसे नेताओं और उद्योगपतियों के बारे में मेरा नजरिया सकारात्मक हो गया है
जिनमें सादगी और दान देने का इतना बड़ा दिल है। जोश मजुका की जिंदगी से सीख लेने की जरुरत
शायद उस समय ज्यादा पड़े जब चंद पैसों में ईमान खरीदने की कोशिश बहुत सारे लोग करने लगते हैं। 

Friday, 26 December 2014

mulayam ki bahu se mulaqat

एक मुलाकात मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू के साथ

कुछ वक्त पहले मैं यूपी सदन में ठहरे एक दोस्त से मिलने गया था..चाय पीने के दौरान दोस्त ने कहा
दीदी से मिलोगे..मैने आश्चर्य से पूछा. दीदी..उसने कहा मुलायम सिंह जी की छोटी बहू यहीं रुकी हैं।
मैने कहा बिल्कुल मिलूंगा..उनके बारे में ज्यादा नहीं जानता था..मोदी की तारीफ करने पर विवाद पैदा हुआ था..
इसी तरह की कुछ खबरें उनके बारे में पढ़ी थी और समाजवादी पार्टी का गाना आओ मिलकर देश बचाना है..
नेता जी को दिल्ली पहुंचाना है..इसको एक आध बार समाजवादी पार्टी के कार्यक्रम में सुन चुका था..उनसे मेरा परिचय बस
इसी के जरिए था..सुबह करीब 10 बज रहे थे..वो यूपी सदन के दूसरे माले के स्यूट में रुकी थी..
बाहर कुछ सुरक्षा कर्मी तैनात थे। मेरे दोस्त ने कहा जूता उतारना पड़ेगा क्योंकि छोटी बच्चा फर्श पर चलता है
इसके कारण दीदी भी जूता या चप्पल अंदर नहीं पहनती है।
मैं और मेरा दोस्त उस स्यूट के ड्राईंगरुमनुमा जगह पर बैठ गए..कमरे के अंदर से पूजा
करने की आवाज आ रही थी..मेरे जेहन में उप्र के सबसे ताकतवर राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखने वाली महिला
की कई छवि उमड़-घुमड़ रही थी। लेकिन पांच सात मिनट इंतजार करने के बाद जब वो आई तो उनके पैरों में चप्पल नहीं थी..
दरम्याना कद और सिम्पली ब्यूटीफुल। उनके बारे में बस अंग्रेजी का यही शब्द लिख सकता हूं। यूनिवर्सिटी आफ मैनचेस्टर
से इंटरनेशनल रिलेशन में मास्टर की डिग्री ले चुकी हैं। जरुरत के मुताबिक ही अंग्रेजी बोलने वाली ये महिला मुलायम की
छोटी बहू और प्रतीक यादव की पत्नी अपर्णा यादव हैं।  
छोटे से औपचारिक परिचय के बाद बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ..वो हर्ष एनजीओ की ब्रॉड अंबेसडर हैं
इसके जरुए महिलाओं के बीच में पुलिस और सिस्टम के बारे में जागरुकता फैलाने का काम करती है।
उन्होंने कहा उप्र इतना बड़ा है और सामाजिक काम करने का इतना स्कोप है कि जितना काम करो उतना कम है।
वो कहती है पुलिस को लेकर समाज में काफी डर है खासतौर पर महिलाएं थाने जाने से घबराती है..
मैं उन्हें इस बारे में लगातार जागरुक कर रही हूं कि अपनी समस्याओं को लेकर वो बेखौफ थाने जाए और
शिकायत करे। वो एक मोबाइल ऐप भी लॉंच करने की सोच रही है जिससे मुसीबत के समय महिलाएं तुरंत
सहायता के लिए पुलिस से संपर्क साथ सके।
इन सारे विषयों पर चर्चा करने के बाद मैने माहौल को हल्का करने के लिए पूछा..प्रतीक से आपकी मुलाकात कैसे हो गई।
वो हंस पड़ी बोली हां मै लोरेटो कान्वेंट में पढ़ती थी.प्रतीक सीएमएस में पढ़ते थे..
वो मुझसे दो साल बड़े हैं..मैं जब 9 वीं क्लास में थी प्रतीक 11 वीं में थे..
तब मेरी मुलाकात एक छोटी सी बर्थ डे पार्टी में उनसे हुई थी।
प्रतीक की मां यानि मेरी सासु मां को पता था कि मैं गाना अच्छा गाती हूं..
उसी गाने ने जिंदगी को एक शानदार मोड़ दे दिया..मैने पूछा वो कौन सा गाना था..
वो झेंपते हुए बोली देवदास फिल्म का ये सिलसिला है प्यार का..
ये कहते हुए वो हंसने लगी..कहने लगी इस गाने के बाद
प्रतीक के याहू मैसेनजर पर कई मैसेज आए..मैने सात दिन बाद
ये मैसेज पढ़े..इतना सुनते ही हम लोग हंसने लगे..
मैने कहा शुक्र है आज का दौर नहीं था...

राजनीति को ना..

राजनीतिक परिवार की बहू किस नेता की तारीफ करती है किसकी बुराई ये हमेशा से लोगों के लिए दिलचस्पी का
विषय रहा है। मुलायम सिंह के प्रति सम्मान और अखिलेश की तारीफ के कसीदे सुनकर मैं बोला
इन दोनों को छोड़कर कौन से नेता को आप पसंद करती है..क्या मोदी अच्छा काम कर रहे हैं..
वो झिझकते बोली मोदी का फिलहाल का काम अच्छा है..लेकिन बदलते वक्त में उनकी क्या छवि मेरे दिमाग होगी..
कहना मुश्किल है..लेकिन गांधी जी और अमेरिका का राष्ट्रपति जॉन एफ केनडी की मैं प्रशंसक हूं।
लेकिन मैं खुद राजनीति नहीं करना चाहती हूं.बस समाज के लिए अच्छा काम कर सकूं..इसी पर मेरा फोकस है..
भातखंडे संगीत विद्यालय से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ले चुकी अपर्णा यादव की मनपसंद ठुमरी..
अवध के नवाब वाजिद अली शाह की लिखी..बाबुल मोरा नईहय्यर छूटा जाए..
बातचीत के सिलसिले को आगे बढ़ाती वो कहती है आज का मीडिया जिम्मेदार नहीं है..
किसी बात पर रिसर्च नहीं करता है..मेरे पिता भी टाइम्स आफ इंडिया के संपादक रहे हैं..
वो दौर था जब पत्रकार रिसर्च करके पूरी जिम्मेदारी से खबर लिखते थे..
आज का पत्रकार क्या लिख दे..कुछ पता नहीं है..
मैं हंसा मैने कहा ये आरोप वाजिब भी है और जरुरी भी..
कुछ देर बातचीत के सिलसिले के बाद मैने मोबाइल में समय देखा..
फिर अपर्णा यादव को देखकर मैं उठ खड़ा हुआ..
मैने कहा मैम फिर मिलेंगे..मैं आपके मुलाकात का ब्यौरा ब्लॉग पर लिखूंगा
तो नाराज तो नहीं होंगी..बदले में वो सौम्यता से हंस पड़ी..

Tuesday, 4 November 2014

http://khabar.ndtv.com/news/india/questions-on-bawana-mahapanchayat-689007

Monday, 13 October 2014

love jehad

राजनीतिक फायनेंस से बने लव जेहाद में नया मोड़

गंदी सी कमीज में नजरें नीची करके 55 साल का अधेड़ शख्श
मेरठ की कचेहरी में गुमसुम बैठा था। उसके सामने ठंडी हो चुकी चाय पर मक्खियां अब भी भिनभिना रही थी।
मानो वो अंदर से टूटा हुआ था और मेरी हिम्मत उससे
सवाल जवाब करने की नहीं हो रही थी । उसके बगल में बैठी वकील चेतना शर्मा लगातार
एक के बाद हमले पुलिस पर किए जा रही थी। ये उसी पीड़ित लड़की के पिता है
जिसने इसी साल 2 अगस्त को रेप और जबरन धर्म परिवर्तन का आरोप दूसरे सांप्रदाय के
कुछ लोगों पर लगाया था। इसी आरोप की बोतल से लव जेहाद का जिन्नाद निकला था। और देखते ही देखते
इसने कुछ नेता के हुक्म पर इसे एक बड़े राजनीतिक बखेड़े में बदल दिया था। इसी केस में पुलिस ने 9 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया था।
और वो सभी जेल की सलाखों के पीछे है।
लेकिन रविवार दोपहर पीड़ित लड़की अपने गांव खरखौंदा से भाग कर
20 किमी दूर मेरठ के महिला थाने पहुंची। उसने कहा कि उसकी जान को अपने ही परिवारवालों से खतरा है।
और वो अपनी मर्जी से कलीम नाम के लड़के के साथ गई थी। परिवार के दबाव में आकर उसने रेप का मामला दर्ज कराया था।
अब उसी लड़की का पिता कचेहरी में बैठा वकीलों से कानूनी राय ले रहा है।पिता का कहना है कि सद्दाम नाम का लड़का
उसे जबरन महिला पुलिस थाने में लाकर ये बयान दिलवाया है। गांव के कुछ लोग जो लड़की और उसके परिवार
के रहनुमा बने थे..अब इस पिता पर लड़की को न संभाल पाने का आरोप लगा सामाजिक बहिष्कार तक की धमकी दे रहे हैं।
इस पिता के सामने एक तरफ लड़की के चलते सामाजिक बदनामी और दूसरी तरफ कोर्ट कचेहरी तमाम राजनीतिक फायनेंसरों का दबाव।
राजनीति और जांच की गुत्थी में पीड़ित लड़की और उसका परिवार उलझकर रह गया है।

रेप की बुनियाद पर राजनीतिक महत्वांकाक्षा

पीड़ित लड़की के अब तक तीन बयान हुए हैं। पहला पुलिस के सामने दूसरा मजिस्ट्रेट के सामने
तीसरा रविवार को पुलिस और सिटी मजिस्ट्रेट को दिया गया ताजा बयान। तीनों बयानों में कई झोल है।
हालांकि इस ताजा बयान से इस केस के ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है अगर लड़की इसी बयान को
कोर्ट में देती है। तो जाहिरतौर पर केस कमजोर पड़ेगा। लेकिन पीड़ित लड़की से रेप के मामले में बंद कलीम
के साथ वो खुद अपनी मर्जी से गई थी। वो उसका प्रेमी है इस बात का जिक्र उसने अपने हालिया के बयान में किया है।
पीड़ित लड़की ने ये भी कहा कि अभी इस मामले से जुड़ी और सच्चाई सामने आना बाकी है। लेकिन ये तय हैं कि
गांव की प्रधानी से लेकर सूबे की राजनीति करने के लिए इसे हथियार के तौर पर प्रयोग किया गया है। मेरठ के एसएसपी ओंकार सिंह
कहते हैं कि मामला अदालत में है अभी रेप या जबरन धर्म परिवर्त हुआ इस बारे में कुछ कहना मुश्किल है। लेकिन जरा सोचिए कि
आप अगर इस लड़की के पिता होते है तो ऐसे हालात में क्या करते...अब अगले चुनाव तक ये किसी के लिए मुद्दा नहीं होगा। उन लोगों
के लिए भी जिन्होंने परिवार आर्थिक और सामाजिक मदद देने की बात कही थी।
लेकिन इसमें एक लड़की का भविष्य और पिता का पूरा परिवार जरूर
तहस नहस हो गया है जो अपने बच्चों के सपनों को पूरा करने के लिए मेरठ से दिल्ली मेहनत मजदूरी करने जाता था।







merath se lautkar

http://khabar.ndtv.com/news/india/love-jihad-why-girl-retracted-from-statement-what-is-the-issue-679071

Sunday, 14 September 2014

du election

अच्छे संकेत देती दिल्ली की छात्र राजनीति
दिल्ली विश्वविद्यालय में चारों सीटे बीजेपी की स्टूडेंट विंग एबीवीपी ने बड़े अंतर से जीता। एनएसयूआई को दूसरे नंबर पर रहकर संतोष करना पड़ा।
लेकिन वहीं जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में चार सीटें आईसा ने जीता..यहां दूसरे नंबर के लिए एबीवीपी और प्रोग्रेसिव लेफ्ट फ्रंट के बीच मुकाबला रहा।
देश में सबसे प्रतिष्ठित माने जाने वाले इन दोनों विश्वविद्यालय में छात्र संगठनों की सक्रियता, बिना किसी बवाल के चुनाव का होना, भविष्य के अच्छे राजनीतिक
संस्कार की ओर इशारा भी करती है। दिल्ली के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की छात्र राजनीति के लिए ये साल बड़े बदलाव का गवाह भी बना।
अपनी अंग्रेजियत और इलीटीसिज्म के लिए मशहूर सेंट स्टीफेंस कालेज में हिंदीभाषी रोहित कुमार यादव का प्रेसीडेंट बनना भी इसी के तरफ इशारा करता है।
18 साल बाद जीती एबीवीपी 
भारी सुरक्षा बंदोबस्त के बीच शनिवार को दिल्ली पुलिस लाइन में दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनाव की काउंटिंग हो रही थी।
इक्का-दुक्का छात्र नेताओं और मीडियाकर्मियों के सुगबुगाहट के अलावा शांतिपूर्ण तरीके से तीन घंटे तक मतो की गणना हुई।
एक लाख से ज्यादा छात्रों वाले दिल्ली विश्वविद्यालय के 28 उम्मीदवारों में चार का चुनाव करने के लिए 50 हजार छात्रों ने अपने मतों का प्रयोग किया।
जब रिजल्ट आए तो पता चला कि 18 साल बाद एबीवीपी के चारों उम्मीदवारों ने जीत हासिल की। अध्यक्ष पद पर मोहित नागर को 20718 वोट मिले जबकि एनएसयूआई के गौरव तुसीर को 19804 वोट
उपाध्यक्ष पद पर परवेश मलिक, सचिव पद पर कनिका शेखावत और संयुक्त सचिव पद पर आशुतोष माथुर ने सर्वाधिक मतों से जीत हासिल की। 
कभी एनएसयूआई का गढ़ रहा दिल्ली विश्वविद्यालय अब उसके हाथों से निकलता दिखाई दे रहा है। इस बार आईसा ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।
लेकिन उसे अभी लंबा सफर तय करना है।
जेएनयू में आईसा का ढंका बजा
एक दिन बाद यानि रविवार को जवाहर लाल नेहरू छात्र संघ चुनाव में आईसा ने सबका सूपड़ा साफ कर दिया।
चारों सीटों पर इनके उम्मीदवार ने जीत हासिल की। इस चुनाव में एबीवीपी और लेफ्ट प्रोग्रेसिव फ्रंट ने भी अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराई है।
जेएनयू में प्रेसीडेंट आईसा के आशुतोष जीते जिन्हें 1386 वोट मिले। जबकि वीइस प्रेसीडेंट पद अनंत, जनरल सेक्रेटरी पद पर चिंटू और ज्वाइंट सेक्टरी पद पर
जेएस शफाकत ने जीत हासिल की। इस चुनाव में वाइस प्रेसीडेंट और जनरल सेक्रेटरी पद पर एबीवीपी दूसरे नंबर पर रही है..जबकि दो अन्य पोस्टों पर लेफ्ट प्रोग्रेसिव फ्रंट दूसरे नंबर पर रहा।
हालांकि इस बार आईसा के पूर्व प्रेसीडेंट अकबर चौधरी पर लगे यौन उत्पीड़न के आऱोपों को दूसरे छात्र संगठनों ने मुद्दा बनाया था।
लेकिन उसके बावजूद आईसा की धमक जेएनयू में कम नहीं हुई बल्कि और मजबूती के साथ वो उभरा।
हालांकि दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में इस बार छपे पम्फलेट का प्रयोग खूब हुआ..कुछ लोगों ने छात्रनेताओं पर आपराधिक मुकदमें दर्ज होने की बात भी उठाई।
लेकिन इनको अगर छोड़ दे तो छात्र संघ चुनाव का अच्छे तरीके से होना और अच्छे छात्र नेताओं का चुना जाना, ऐसी बातें है जो राजनीतिक परीक्षण में सफलता की गारंटी देती नज़र आती है।

Thursday, 4 September 2014

documentary

http://khabar.ndtv.com/video/show/documentary-ndtv-india/16-235637