Friday, 27 March 2015

राजनीतिक भक्ति की कट्टरता का दौर

मुझे व्यक्तित्व भक्ति से बहुत चिढ़ है खासतौर पर नेताओं की।
नेता को भगवान या खुदा मानकर आजकल समर्थक भक्त बनकर बड़ी तादात में चारण वंदना करना शुरू करतें हैं जिनमें आलोचना के लिए किंचित मात्र भी जगह नहीं होती है। ये राजनीतिक भक्ति के कट्टरवाद का दौर है।
इन भक्त को चार वर्गों में विभाजित करने की सोच रहा हूं। पहले नंबर पर वो राजनीतिक भक्त है जो पार्टी के सिद्धांतों के आधार उसके नेताओं की भक्ति करते हैं। वो राजनीतिक कार्यकर्ता कहलाते हैं। कुछ ऐसे भक्त है जो नेता को एक खास धार्मिक कट्टरता के समर्थन या विरोध करने के लिए पूजने या इबादत करने लगते हैं। ये तार्किक नहीं बल्कि धार्मिक सुरक्षा या असुरक्षा या खास पूर्वाग्रह से भक्त बन जाते हैं। तीसरी जमात में कुछ ऐसे कथित बुद्धिजीवी, पत्रकार, डाक्टर और वकील होते हैं जो तर्क की परिधि खींच कर नेता को जबरन उसके अंदर ले आते हैं और शुरू हो जाते हैं उसकी तारीफों के पुल बांधना। इनके अंदर एक राजनीतिक पहचान की आकांक्षा भी है जो अव्यक्त रूप में होती है। जिसकी परिणति चौंकाने वाली होती है। चौथी जमात उन मौसमी भक्तों की होती है जो तात्कालिक कारणों से किसी नेता की तारीफ कर भक्त बनते हैं और और वक्त बितने के साथ तात्कालिक कारणों या नफे-नुकसान का आंकलन कर उसे छोड़ भी देते है। ऐसे राजनीतिक होशियार वोटरों के चलते ही हमारा लोकतंत्र मजबूत बनता है। इसी चौथी और अंतिम जमात की वकालत करता हूं जिनके लिए मुद्दे मायने रखते हैं व्यक्ति नहीं।
मैं हमेशा दुनिया के उस बड़े राजनेता विसटन चर्चिल के वक्तव्य को याद रखता हूं उन्होंने कहा था कि लोकतंत्र में नेता का काम होता है लोगों को सपने दिखाना, लेकिन कोई जरुरी नही है कि वो पूरे ही होंगे। यानि आशावान बनिए, निराश नेता से हों लेकिन वक्त के साथ लोकतंत्र में फिर आस्था रखिए। भक्त नेता के नहीं लोकतंत्र के बनिए भला होगा।
इससे अलग एक बात लोगों की जिंदगी में ऐसे बहुत से लोग होतें है जिनसे वे प्रभावित रहते हैं। संकट की घड़ी या पेशेगत दुविधा के क्षणों में उनसे मार्गदर्शन की उम्मीद भी करते हैं। हम और आप उन दोस्तों और वरिष्ठ जनों से हद तक प्रभावित भी रहते हैं लेकिन ये भक्ति के दायरे में नहीं आता है हम तब अनजाने में भक्त बन जाते हैं जब हम उन्हें भी ईश्वर या खुदा मान लेने की भूल करते हैं।

Tuesday, 24 March 2015

singapore ex prime minister

क्यों भारत से नाराज रहते थे सिंगापुर के ली क्वान यू...

मेरी नजर में सिंगापुर के पूर्व प्रधानमंत्री ली क्वान यू इस दुनिया के शायद आखिरी लोकतांत्रिक तानाशाह नेता थे। जिन्हें पीपुल्स एक्शन पार्टी के नेता के तौर पर छह दशक तक लोगों ने चुना और लोकतांत्रिक तरीके से तानाशाही करने का मौका दिया। बदले में उन्होंने लोगों को कम बोलने, सीमित धार्मिक आजादी और बात बात में लोकतंत्र के चौथे खंबे को पकड़ने की आजादी लगभग न के बराबर दी। लोगों को मुंह बंद करके काम करने की आदत डलवाई उसके बदले में लोगों को शांतिपूर्ण तरीके से पश्चिम का वैभव और पूर्व के लजीज व्यंजनों का स्वाद मिला। उनके बारे में कुछ पढ़ने के बाद उनसे प्रभावित होने के बजाए मेरे मन में उनकी छवि एक ताकतवर लेकिन धूर्त नेता की बनी जो शायद कल की इंदिरा गांधी और आज के नरेंद्र मोदी के कुछ हद तक करीब है। जो दिखावे के लिए लोकतांत्रिक मूल्यों की दुहाई देते हुए कठोरता से अपने नव उदारवाद के मॉडल को लागू करवाना चाहते हैं। ली क्वान यू भारत को एक देश नहीं बल्कि ब्रिटेन की रेल लाइन के करीब बसने वाले 35 देशों का समूह कहा करते थे ।  
इसमें कोई शक नहीं है कि ली क्वान सिंगापुर की ही तरह समाजवाद और नवउदारवाद के एक अजीब घालमेल की पैदाईश थे। वो शायद इसलिए भी क्योंकि वो पैदाईशी चीनी थे और व्यवहारिक पूंजीवादी के कट्टर समर्थक ब्रिटेन की छत्रछाया में पले थे। वो जनता को समाजवादी अनुशासनात्मक तरीके से हांकते रहे और सिंगापुर का विकास पूंजीवादी तरीके से करते रहे। वो ऐसे पहले नेता थे जिन्होंने जनता को अनुशासित रखने के लिहाज से इंदिरा गांधी के इमरजेंसी लगाने का समर्थन किया था। उनका इस बात को लेकर खासा आग्रह रहता था कि भारत एक महान देश है लेकिन ये अपने को महान बनाने का अवसर तेजी से गंवा रहा है। वो भारत को पसंद करते थे, लेकिन नौकरशाही के व्यवस्थागत ढांचे को नफरत की हद तक नापसंद भी करते थे। उनका कहना था कि भारत के नौकरशाह अपने को सुविधा देने वाला नहीं बल्कि नियमों को लागू करवाने वाला मानते है। यहीं से संस्थागत ढ़ांचे में बुनियादी गलती शुरू होती है वो कहते हैं कि उद्योगपतियों के बारे में अच्छी सोच के बजाए किसी तरह पैसा ऐंठने की सोच ज्यादातर नौकरशाहों में रहती है। जो किसी भी देश के विकास की राह में एक बहुत बड़ा रोड़ा है। हालांकि बहुत सारे भारतीय ये जरुर आपको कहते मिल जाएंगे कि वो सिंगापुर के दमघोंटू अनुशासनात्मक जीवन के बजाए दिल्ली के प्रदूषित माहौल में अच्छा प्रदर्शन करना ज्यादा पसंद करते है। 
लेकिन हमें ये जरुर मानना पड़ेगा कि वो ये सारी बातें कहने के लिए इसलिए हकदार थे क्योंकि 1965 में ब्रिटेन से आजादी मिलने के बाद वो जिस झंझावात से अपने देश को निकाल कर एक चमचमाते वित्त बाजार में बना दिया था। जिसकी सुरक्षा करने के लिए उसके पास कोई भारी-भरकम सेना या सुरक्षा कवच नहीं है, ये अपने आप में हैरान करने वाला है। 
हमें उनसे राजनीतिक व्यवहारवाद के अनुशासन को कुछ हम तक सीखने की जरुरत है तभी लोकतांत्रिक मूल्यों को भीड़तंत्र के खतरों से बचाया जा सकता है। वरना हम इसी तरह संकीर्ण राजनीतिक सोच और बड़े खतरों की मनगढ़ंत कहानियों के बीच अपने देश की बदहाली का महज रोना तो रो सकते हैं लेकिन देश के विकास के लिए कठोर फैसला नहीं कर सकेंगे।    

Monday, 16 February 2015

media entry ban

मीडिया के कैमरों से कोफ्त जायज हक है

तुर्की में देशभर के पुलिस स्टेशन के अंदर मीडिया को जाने पर पाबंदी लगा दी गई थी, गाजा में इंटरनेशनल मीडिया को जाने की पाबंदी थी। इनके कारणों पर मैं नहीं जाऊंगा कई अच्छे हो सकते हैं कुछ खराब हो सकते हैं। ब
मैं ये नहीं कह रहा हूं कि दिल्ली सचिवालय में मीडिया के प्रवेश पर पाबंदी इतने बड़े मुद्दे हैं जिनका जिक्र मैने किया है। मीडिया के कैमरों से कोफ्त वाजिब भी है सवालों से सालभर तक परहेज आपका जायज हक है। अरविंद केजरीवाल का वो भाषण काबिले-तारीफ है जिसमें घमंड नहीं आने की बात कही गई थी। ये भी सच है कि पिछले साल जब अरविंद केजरीवाल शपथ लेकर दिल्ली सचिवालय पहुंचे थे और सैकड़ों कैमरे बदहवासी की हालत में उनके पीछे लगे थे। तब मुझे बहुत बुरा लगा था। गुस्सा आया अपने मीडिया के सहकर्मियों पर कि हम सभ्य तरीके से काम क्यों नहीं कर सकते हैं। सालभर बाद फिर अरविंद केजरीवाल भारी बहुमत से आए। जनता ने सवाल पूछने तक के लिए विपक्ष भी नहीं दिया ।लेकिन हम अपने तरीके में बदलाव करेंगे नहीं तो पाबंदी तो झेलनी ही पड़ेगी। शनिवार को मीडिया की इंट्री बैन थी नए मीडिया सलाहकार
नागेद्र शर्मा ने कहा कि सोमवार को कुछ रास्ता निकाल लिया जाएगा।
हम सड़कों से कवरेज और खबरों के लिए प्रेस नोट का इंतजार होने लगे। सोमवार शाम तक कई राउंड की बात हुई, सरकार को ये भी विकल्प दिया गया कि कैमरे से अगर दिक्कत है तो उसे मीडिया रुम तक ही सीमित कर दिया जाए। केवल मान्यता प्राप्त पत्रकार या
जिनके पास मान्यता नहीं है उन्हें पास बनवाकर जाने दिया जाए। लेकिन सरकार में असमंजस की स्थिति बनी रही। उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया जब
मीडिया रुम में आए तो कुछ पत्रकारों ने उनसे चीखकर मीडिया के इंट्री बैन पर सवाल पूछा और वो शालीनता से उठकर चले गए।
बाद में नागेंद्र शर्मा ने कहा कि उनके सबसे ताकतवार मंत्री के साथ दुर्व्यवहार हुआ। अब जैसे चल रहा है वैसे ही चलेगा मीडिया को इंट्री कतई नहीं देंगे। हमें जनता ने पांच साल के लिए जनादेश दिया है हम उसी के प्रति जवाबदेह रहेंगे जब वो मुझसे बात कर रहे थे तब मेरे जेहन में ब्रिटेन के एक नेता का बयान जेहन में घूम रहा था जब इराक पर हमले का मन अमेरीका और ब्रिटेन ने बनाया तब उसने इसे हूब्रिस सिंड्रोम नाम दिया था। जो बुश-ब्लेयर और शक्ति के नशे का गठजोड़ था।
सरकार को जनता के प्रति ही जवाब देह रहना चाहिए । वैसे भी मीडिया
किसी भी अच्छे काम के लिए नहीं जानी जाती है दलाली, मक्कारी और पेड न्यूज के लिए शायद ज्यादा बदनाम हो गई है। अरविंद केजरीवाल ने पिछले साल इस बात की तस्दीक करती हुई कई तकरीर भी जनता के बीच दी थी। नागेंद्र शर्मा आप ऐसे ही मीडिया पर पाबंदी रखे लेकिन शायद पत्रकारिता मंत्रियों के पास बैठकर चाय पीने, मोबाइल नंबर सेव कराने, हाथ मिलाकर धन्य होने या
एक्सक्लूसिव टिकटैक भर का नाम नही है हां ये बात अलग है कि हम इन्ही चश्मों से आज के पत्रकारों को ज्यादा देखते हैं।
लेकिन जैसे राजनीति में सादगी और ईमानदार के संकेत देकर आपने लोकतंत्र को मजबूत किया वैसे ही मीडिया के प्रवेश पर पाबंदी लगाकर आपने उन लोगों के हाथ में उस्तरा जरुर पकड़ा दिया जो सच्चाई की गर्दनें काटने के लिए कुख्यात रहे हैं।


Thursday, 1 January 2015

ये हैं दुनिया के सबसे गरीब राष्ट्रपति

ये हैं दुनिया के सबसे गरीब राष्ट्रपति

उन्हें गरीब राष्ट्रपति के बजाए साधारण कहलाना ज्यादा पसंद है।
उनके पास दरम्याना कद, बेढोल शरीर, चेहरे पर साधारण लेकिन सरल मुस्कान है।
वो तेरह साल जेल में बिता चुके हैं। और अपनी तनख्वाह की 90 फीसदी रकम दान दे देते हैं।
ये दुनिया के सबसे गरीब और विनम्र उराग्वे के राष्ट्रपति जोश मजुका है। उनके बारे में किसी अखबार में पढ़ रहा था।
जितना पढ़ता गया मेरी दिलचस्पी उतनी उनके व्यक्तित्व को जानने की बढ़ती गई।
उनके पास 90 के दशक की एक छोटी फोक्सवैगन बीटल कार है। जिससे वो राष्ट्रपति कार्यालय जाते हैं।
मेरे मन में कभी उनकी छवि के आसपास अरविंद केजरीवाल या ममता बनर्जी की कार घूमती।
तो कभी अमेरीका में नरेंद्र मोदी का नींबू पानी पीना घूमता है।
मैं सोच रहा था क्या इस तरह की सादगी और गरीबी के आसपास भी हमारे कोई नेता फटकते हैं।
जवाब गांधी जी के आसपास घूम रहा था..हमारी पीढ़ी ने जब होश संभाला तो मुझे याद है
जब वीपी सिंह ने प्रधानमंत्री पद संभाला तो वीआईपी कारों के काफिले को कम किया।
जो अखबार की सुर्खियां बनी। यही खबर दिल्ली से करीब 600 किमी दूर जब मेरे शहर
बहराईच के घर में पहुंची तो मैंने अपने पिता के चेहरे पर एक संतोष का भाव देखा था।
जो शायद ये अहसास दिलाता था कि हमारा देश एक जिम्मेदार हाथों में है।
पता नहीं क्यों सादगी में मुझे सकारात्मकता दिखती है।
वक्त बीतता गया अब मीडिया में हमारे नेताओं की वीआईपी कारों और बड़े घर की चर्चा होती है या आलोचना।
खैर उराग्वे के राष्ट्रपति जोश मजुका के बारे में आपको जानकारी देने के बजाए हम अपने देश के नेताओं की चर्चा
करने लगे जो इन सुविधाओं को जरुरत बताकर लेते हैं फिर सादगी का ढोल पीटते हैं।
जोश मजुका जब पांच साल के थे तो उनके गरीब किसान पिता दिवालिया होकर मर गए।
बचपन संघर्ष में बीता और बाद में क्यूबा की क्रांति से प्रभावित होकर ब्राड फ्रंट नाम का एक संगठन खड़ा किया।
सरकार से गोरिल्ला युद्धा शुरू करने वाले जोश मजुका 1970 में गिरफ्तार कर लिया गया।
लेकिन गिरफ्तारी से पहले सेना से उनका संघर्ष हुआ और उन्हें छह गोली लगी।
एक साधारण से डाक्टर ने उऩकी जान बचाई। इसके बाद उन्हें जेल में डाल दिया गया।
जेल से भी भागने की उन्होंने कोशिश की। 90 के दशक में जब उराग्वे में लोकतंत्र आया तो
उन्हें आजाद किया गया।
जोश मजुका ने लुशिया नाम की एक महिला से शादी की। जो गोरिल्ला युद्ध के दौरान उनके साथ लड़ी थी।
आजकल लुशिया भी सिनेटर है। उनके कोई बच्चे नहीं है..12000 डॉलर की सैलरी का 90 फीसदी दान कर देते हैं।
अपने छोटे से फार्म हाउस में अपनी पत्नी और तीन पैरों वाले एक कुत्ते के साथ रहते हैं। फूल उगाकर बेचते है
यही उनकी आमदनी का जरिया है। हालांकि जोश मजुका खुशकिस्मत है कि केवल साढ़े तीन मिलियन लोगों के एक छोटे
से देश के राष्ट्रपति है। लेकिन उनकी परांपरा से व्यवहारिक नीति बनाने की सोच का मैं कायल हूं।
ऐसे नेताओं और उद्योगपतियों के बारे में मेरा नजरिया सकारात्मक हो गया है
जिनमें सादगी और दान देने का इतना बड़ा दिल है। जोश मजुका की जिंदगी से सीख लेने की जरुरत
शायद उस समय ज्यादा पड़े जब चंद पैसों में ईमान खरीदने की कोशिश बहुत सारे लोग करने लगते हैं।