मुझे व्यक्तित्व भक्ति से बहुत चिढ़ है खासतौर पर नेताओं की।
नेता को भगवान या खुदा मानकर आजकल समर्थक भक्त बनकर बड़ी तादात में चारण वंदना करना शुरू करतें हैं जिनमें आलोचना के लिए किंचित मात्र भी जगह नहीं होती है। ये राजनीतिक भक्ति के कट्टरवाद का दौर है।
इन भक्त को चार वर्गों में विभाजित करने की सोच रहा हूं। पहले नंबर पर वो राजनीतिक भक्त है जो पार्टी के सिद्धांतों के आधार उसके नेताओं की भक्ति करते हैं। वो राजनीतिक कार्यकर्ता कहलाते हैं। कुछ ऐसे भक्त है जो नेता को एक खास धार्मिक कट्टरता के समर्थन या विरोध करने के लिए पूजने या इबादत करने लगते हैं। ये तार्किक नहीं बल्कि धार्मिक सुरक्षा या असुरक्षा या खास पूर्वाग्रह से भक्त बन जाते हैं। तीसरी जमात में कुछ ऐसे कथित बुद्धिजीवी, पत्रकार, डाक्टर और वकील होते हैं जो तर्क की परिधि खींच कर नेता को जबरन उसके अंदर ले आते हैं और शुरू हो जाते हैं उसकी तारीफों के पुल बांधना। इनके अंदर एक राजनीतिक पहचान की आकांक्षा भी है जो अव्यक्त रूप में होती है। जिसकी परिणति चौंकाने वाली होती है। चौथी जमात उन मौसमी भक्तों की होती है जो तात्कालिक कारणों से किसी नेता की तारीफ कर भक्त बनते हैं और और वक्त बितने के साथ तात्कालिक कारणों या नफे-नुकसान का आंकलन कर उसे छोड़ भी देते है। ऐसे राजनीतिक होशियार वोटरों के चलते ही हमारा लोकतंत्र मजबूत बनता है। इसी चौथी और अंतिम जमात की वकालत करता हूं जिनके लिए मुद्दे मायने रखते हैं व्यक्ति नहीं।
मैं हमेशा दुनिया के उस बड़े राजनेता विसटन चर्चिल के वक्तव्य को याद रखता हूं उन्होंने कहा था कि लोकतंत्र में नेता का काम होता है लोगों को सपने दिखाना, लेकिन कोई जरुरी नही है कि वो पूरे ही होंगे। यानि आशावान बनिए, निराश नेता से हों लेकिन वक्त के साथ लोकतंत्र में फिर आस्था रखिए। भक्त नेता के नहीं लोकतंत्र के बनिए भला होगा।
इससे अलग एक बात लोगों की जिंदगी में ऐसे बहुत से लोग होतें है जिनसे वे प्रभावित रहते हैं। संकट की घड़ी या पेशेगत दुविधा के क्षणों में उनसे मार्गदर्शन की उम्मीद भी करते हैं। हम और आप उन दोस्तों और वरिष्ठ जनों से हद तक प्रभावित भी रहते हैं लेकिन ये भक्ति के दायरे में नहीं आता है हम तब अनजाने में भक्त बन जाते हैं जब हम उन्हें भी ईश्वर या खुदा मान लेने की भूल करते हैं।
नेता को भगवान या खुदा मानकर आजकल समर्थक भक्त बनकर बड़ी तादात में चारण वंदना करना शुरू करतें हैं जिनमें आलोचना के लिए किंचित मात्र भी जगह नहीं होती है। ये राजनीतिक भक्ति के कट्टरवाद का दौर है।
इन भक्त को चार वर्गों में विभाजित करने की सोच रहा हूं। पहले नंबर पर वो राजनीतिक भक्त है जो पार्टी के सिद्धांतों के आधार उसके नेताओं की भक्ति करते हैं। वो राजनीतिक कार्यकर्ता कहलाते हैं। कुछ ऐसे भक्त है जो नेता को एक खास धार्मिक कट्टरता के समर्थन या विरोध करने के लिए पूजने या इबादत करने लगते हैं। ये तार्किक नहीं बल्कि धार्मिक सुरक्षा या असुरक्षा या खास पूर्वाग्रह से भक्त बन जाते हैं। तीसरी जमात में कुछ ऐसे कथित बुद्धिजीवी, पत्रकार, डाक्टर और वकील होते हैं जो तर्क की परिधि खींच कर नेता को जबरन उसके अंदर ले आते हैं और शुरू हो जाते हैं उसकी तारीफों के पुल बांधना। इनके अंदर एक राजनीतिक पहचान की आकांक्षा भी है जो अव्यक्त रूप में होती है। जिसकी परिणति चौंकाने वाली होती है। चौथी जमात उन मौसमी भक्तों की होती है जो तात्कालिक कारणों से किसी नेता की तारीफ कर भक्त बनते हैं और और वक्त बितने के साथ तात्कालिक कारणों या नफे-नुकसान का आंकलन कर उसे छोड़ भी देते है। ऐसे राजनीतिक होशियार वोटरों के चलते ही हमारा लोकतंत्र मजबूत बनता है। इसी चौथी और अंतिम जमात की वकालत करता हूं जिनके लिए मुद्दे मायने रखते हैं व्यक्ति नहीं।
मैं हमेशा दुनिया के उस बड़े राजनेता विसटन चर्चिल के वक्तव्य को याद रखता हूं उन्होंने कहा था कि लोकतंत्र में नेता का काम होता है लोगों को सपने दिखाना, लेकिन कोई जरुरी नही है कि वो पूरे ही होंगे। यानि आशावान बनिए, निराश नेता से हों लेकिन वक्त के साथ लोकतंत्र में फिर आस्था रखिए। भक्त नेता के नहीं लोकतंत्र के बनिए भला होगा।
इससे अलग एक बात लोगों की जिंदगी में ऐसे बहुत से लोग होतें है जिनसे वे प्रभावित रहते हैं। संकट की घड़ी या पेशेगत दुविधा के क्षणों में उनसे मार्गदर्शन की उम्मीद भी करते हैं। हम और आप उन दोस्तों और वरिष्ठ जनों से हद तक प्रभावित भी रहते हैं लेकिन ये भक्ति के दायरे में नहीं आता है हम तब अनजाने में भक्त बन जाते हैं जब हम उन्हें भी ईश्वर या खुदा मान लेने की भूल करते हैं।
No comments:
Post a Comment