Sunday, 17 July 2016

up education

अखिलेश यादव को मास्टर जी पर गुस्सा क्यों आया...

पोषण योजना के तहत उप्र के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अभी हाल में श्रावस्ती गए थे। कार्यक्रम के बाद वो अचानक एक प्राइमरी स्कूल में पहुंचे। पता चला कि पूरे क्लास में एक बच्चे को छोड़कर कोई भी बच्चा हिन्दी की किताब तक नहीं पढ़ पाया। मुख्यमंत्री ने वहां खड़े शिक्षकों को फटकार लगाते कहा कि आप लोग बच्चों को ठीक से पढ़ाते नहीं है। घर के नजदीक पोस्टिंग चाहिए। जबकि आपको तनख्वाह इन्हें पढ़ाने के लिए मिलती है। इस वाकए का जिक्र मैं इसलिए कर रहा हूं क्योंकि ये उस राज्य के मुख्यमंत्री जहां शिक्षा की वार्षिक स्थिति की रिपोर्ट बताती है कि 45 फीसदी बच्चे पांचवी में पहुंचने के बाद भी पढ़ और लिख नहीं पाते हैं। सवाल ये उठता है कि ये मुख्यमंत्री का पब्लिसिटी स्टंट था या उन्हें प्राथमिक शिक्षा की सेहत का अब ध्यान आया है जब उनकी सरकार के एक साल से भी कम वक्त बचे हैं। अभी हाल में सेंटर फॉर सिविल सोसायटी की कार्यशाला में मुझे जाने का मौका मिला। यहां आई जानी मानी शिक्षाविद् प्रो गीता गांधी किंगडम के तथ्य और स्टडी हैरान करने वाले थे। हम अक्सर प्राथमिक शिक्षा में सुधार का सतही हल बजट बढ़ाने, शिक्षकों की भर्ती कर देने और अच्छी स्कूल की इमारत बनाने में खोज लेते हैं। लेकिन गीता गांधी बताती हैं कि उप्र सरकार प्राइमरी स्कूल में पढ़ने वाले हर एक बच्चे पर 1300 रुपए खर्च करती है। लेकिन इतना पैसा खर्च करने के बावजूद अगर सरकारी स्कूलों के बच्चे हिन्दी भी ठीक से नहीं पढ़ पाते हैं तो क्या इस पैसे का उपयोग महज शिक्षकों को मोटी तनख्वाह देने और इमारत पर खर्च करने में होती है। इस बात में बहुत हद तक सच्चाई है क्योंकि ये शिक्षक न तो बच्चों के प्रति जवाब देह हैं और न ही उनके गरीब माता-पिता के प्रति। उप्र की सरकारों पर शिक्षक संघों का जबरदस्त राजनीतिक प्रभाव रहा है। विधानपरिषद में शिक्षकों के लिए सीटें और चुनाव लड़ने की आजादी के चलते उप्र के बहुत सारे शिक्षक पढ़ाने में कम और राजनीतिक ताकत हथियाने में अपनी ज्यादा ऊर्जा खपा रहे हैं। इसी के चलते आए दिन आपने इनको तनख्वाह और भत्तों के लिए प्रदर्शन करते देखा होगा लेकिन बीते चार सालों में सरकारी स्कूलों में बच्चों का इनरोलमेंट 1.16 करोड़ और प्राइवेट स्कूलों में 1.85 करोड़ क्यों है, इसके लिए कोई धरना देते नहीं देखा होगा। राजनीतिकतौर पर ये शिक्ष कितने ताकतवर है इसका अंदाजा प्रो. गीता गांधी के इन आंकड़ों से आप लगा सकते हैं कि उप्र सरकार हर महीने करीब बीस करोड़ रुपए उन शिक्षकों के तनख्वाह पर खर्च करती है जिनके स्कूल में एक बच्चा इनरोल नहीं है। हम कम बजट वाले निजी स्कूलों पर शिक्षा की दुकानदारी और अनट्रेंड शिक्षकों से पढ़ाने का आरोप लगाकर उन्हें बंद करवाने की बात करते हैं। लेकिन सरकार के ट्रेंड शिक्षकों की पढ़ाई हमसे आपसे छिपी नहीं है। तो क्या गरीब बच्चों को हम बजट बढ़ाने वाले कागजी आंकड़ों के रहमोकरम पर छोड़ दें। सही मायने में अगर उप्र की प्राइमरी शिक्षा को सुधारना है तो नई शिक्षा नीति में शिक्षकों की राजनीतिक दखलअंदाजी को सीमित किया जाए। शिक्षकों को सीधे बच्चों और उनके अभिभावकों के प्रति जवाबदेह बनाया जाए। लो बजट निजी स्कूलों को दूर दराज के इलाकों में खोलने को प्राथमिकता दी जाए। मान्यता देने और छात्रवृति के नाम पर स्कूलों से मोटी रकम वसूलने वाले माफियाओं पर लगाम लगाया जाए। सरकारी स्कूलों में अभिभावक कमेटियों का गठन किया जाए। उप्र जैसे बड़े राज्यों में शिक्षा में मूलभूत बदलाव की सख्त जरुरत है। शिक्षा विभाग का मर्ज गंभीर है मुख्यमंत्री जी आपको कड़वी दवा पिलानी होगी।

Sunday, 10 April 2016

नानी का जाना...बहुत कुछ टूट जाना

नानी का जाना...बहुत कुछ टूट जाना

बहराईच अपने माता-पिता से मिलने का मलतब नाना-नानी के घर जाना भी है। बहराईच में सुबह तैयार होकर बाइक निकाली...अनमने तरीके से किक मारी..70 एमएम की एक पूरी 35 साला खामोश पिक्चर मेरे दीमाग में चल रही थी। मेरी बाइक काजीपुर मोहल्ले की संकरी गलियों में दाखिल हुई..पर जेहन इन पुरानी यादों के साथ मोहल्ले की इन गलियों में उस बचपने को भी खोज रहा था जो हर एक दरो-दीवार..जानें-पहचाने घरों के पलस्तर और चूने-सफेदी की पुरानी यादों में कहीं जुड़ा मिला तो कहीं उजड़ा मिल रहा था। मेरी बाइक गली के किनारे पर रुक गई..घर के ऊपर शांति भवन लिखा था दरवाजे पर धर्मदत्त पांडेय का पुराना बोर्ड लगा था।
दरवाजा खटखटाते ही वो अपने आप खुल गया। मैं बैठका के खुले दरवाजे से अंदर दाखिल हुआ...घर में अजीब सन्नाटा पसरा था..गौरय्या की आवाज जब तक इस सन्नाटे को तोड़ देती थी..बैठका से सटे कमरे में नीम अंधेरा छाया हुआ था...बेड पर बिना सिलवट की एक चादर करीने से बिछी थी,
बेड के सिरहाने की हमेशा बंद रहने वाली खिड़की का थोड़ा हिस्सा आज खुला हुआ था। उससे छनकर आने वाली आड़ी-तिरछी धूप मानो इस नीम अंधेरे को बीच से चीर दे रही हो। मेरी आंखे डबडबाने लगी थी इसी बेड पर आमतौर पर लेटी रहने वाली मेरी नानी..अक्सर मेरे आने की आहट पर जाग कर कहती...भय्या रवीश..दिल्ली से कब आए...चलो बैठो...मैं आती हूं। ये कहकर वो अपनी धोती का पल्लू सिर पर रखकर मेरे साथ उस कमरे से बाहर बरामदे तक आ जाती थी। उसी अनजानी आदत ने मुझे इस कमरे में रोक कुछ देर के लिए रोक सा लिया था। नानी के कमरे से बाहर निकल कर बरामदे में आ गया..वहां एक खाली पड़ी कुर्सी थी जिसपर अक्सर मेरी नानी बैठा करती थी..लेकिन मेरे आते ही वो उस कुर्सी पर मुझे बैठाकर खुद फर्श पर बैठ जाया करती थी। कुर्सी खाली थी..उसी से कुछ दूरी पर नीचे पानदान रखा था जिसमें रखे छोटे से सरौते पर नजर रुक गई। कई बार सरौते से डली काटते हुए वो मुझसे कहती थी..भय्या समय बड़ा बलवान होता है..उससे किसी ने मुकाबला करने की कोशिश कि वो खत्म हो गया...बातचीत करते हुए...वो बहू यानि मेरी मामी को बुलाती..एक सांस में कह जाती ...देखो भय्या आए हैं पहले चाय पिलाओ..फिर खाना खिलाओ...फिर मुझे देखते हुए बोलती...और भय्या दुलहन कैसी है...अचानक मेरी नजर पानदान से होते हुए बरामदे में लगी लाइट के स्विचबोर्ड पर चली गई...स्विचबोर्ड पर लगे एक छोटे से खरगोश के स्टिकर को देखकर आंखे और नम हो गई..25 साल पहले खराब हो चुके खिलौने से इस स्टिकर को निकालकर मैंने ही इस बोर्ड पर चिपका दिया था...जिससे जुड़ी यादें आज भी जेहन की किताब में भूली एक चिट जैसी चिपकी हुई है...तभी अचानक पीछे से मामी आई..अरे भय्या तुम कब आए...बैठका का दरवाजा खुला था क्या...मैंने बिना जवाब दिए..रुमाल निकाला और डबडबाई आंखों को फिर
पोंछा..चश्मा ठीक किया और नानी की कुर्सी पर बैठ गया..पानदान के पास नीचे फर्श पर मामी बैठ गई..वो कुछ थकी और बीमार सी लग रही थी..सिर नीचे करके धीरे से बोली...फिर भर्राई आवाज में बोलती ही चली गई...जैसे वो खुद से बात कर रही हो या उस पानदान को सुना रही हों.....भय्या नानी के मरने की खबर मिल गई थी..? दीपावली की छुट्टी पर जब तुम बहराईच से दिल्ली गए थे..उसी के हफ्ते भर बाद उनकी मौत हो गई थी..हम सब इसलिए तुम्हें खबर नहीं किए..कि तुम्हें इतनी जल्दी-जल्दी छुट्टी कहां मिलेगी...प्राइवेट नौकरी में हो..बेकार परेशान होगे...मैं एक टक आंगन में दाना चुग रही गौरय्या को देख रहा था...उसके शोर में मामी की आगे की बातें मानो गुम सी हो गई थी..आंखों के किनारे से पानी की एक धार गाल से होती हुई मेरी कलाई पर गिरी। नाना-नानी की अनगिनत यादें पुरानी बातें एक के बाद एक मेरे दिमाग में चल रही थी...सिर भारी हो रहा था..मैं तेजी से उठा और नानी के कमरे से होते हुए बैठका से बाहर निकल गया..बाइक पर किक मारी और काजीपुरा की उन उधेड़बुन वाली गलियों में गायब हो गया...
पौ फटने वाली थी...सूरज निकलने से पहले आसमान लाल हो चुका था। जागते हुए पत्नी बाहर छत पर आई..बोली अरे रात से यहीं बैठो हो...क्या हुआ। मैं बिना जवाब दिए बाथरूम में घुस गया और आंखे बंद करके जोर जोर से रोने लगा....

Monday, 18 January 2016

दिल्ली की जहरीली हवा को ऑड इवेन की कड़वी दवा



दिल्ली की जहरीली हवा को ऑड इवेन की कड़वी दवा

24 दिसंबर को अरविंद केजरीवाल के 3 फ्लैग स्टॉफ रोड के सरकारी बंगले पर गहमा-गहमी भरा माहौल था। मीडिया के दर्जनों कैमरे और पत्रकार दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के बंगले के बाहर बने पोटा केबिन में जमा हो चुके थे। सुबह के ग्यारह बजे अरविंद केजरीवाल अपने साथी मंत्री गोपाल राय और सतेंद्र जैन के साथ ऑड इवेन फार्मूले को लागू करने का ब्लू प्रिंट बताने लगे। ऑड इवेन फार्मूले के तहत केंद्रीय मंत्रियों और दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्रियों को छूट दिए जाने वाली लिस्ट पढ़ते हुए वे अचानक रुके और बोले कि मै खुद और हमारे मंत्री ऑड इवेन फार्मूले से छूट के दायरे में नहीं होंगे। हम खुद कार पूल करके दफ्तर जाएंगे। ऑड इवेन फार्मूले के तौर पर ये आम आदमी पार्टी की सरकार का खतरनाक हो रहे दिल्ली के प्रदूषण पर ये पहला बड़ा और करारा हमला था। हालांकि दिल्ली सरकार को जब महीना भर पहले दिल्ली डॉयलॉग कमीशन के जानकारों ने बाकायदा एक डेमो करके ये सुझाव दिया। तब खुद अरविंद केजरीवाल समेत कई मंत्रियों के मन में इसे लागू करने को लेकर कई सवाल उमड़ घुमड़ रहे थे। लेकिन टीवी और अखबारों में  जब सुबह बढ़ते प्रदूषण के आंकड़ों में आनंद विहार, पंजाबी बाग जैसे इलाके सुर्खियां बटोरते तो सरकार के माथे पर शिकन आना स्वाभाविक है। खुद अरविंद केजरीवाल कहते हैं कि जब बीमारी गंभीर हो तो कड़वी दवा पीने के लिए तैयार रहना चाहिए। वायु प्रदूषण से हर साल 10 हज़ार लोगों की जान गंवाने के बाद अब दिल्ली वालों को भी इसके खतरे का अंदेशा हो चुका है। इसी के चलते दूसरे राजनीतिक दलों की आलोचनाओं के बावजूद ऑड इवेन फार्मूले को ज्यादातर दिल्लीवालों का समर्थन मिला है। ये शायद पहली बार जब लोगों ने इस फार्मूले को कायदे कानून से ज्यादा खुद के सेहत से जुड़ा मसला मानकर इसका खुद से पालन किया। हालांकि इस दौरान दिल्ली ट्रैफिक पुलिस और ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट ने भी मुस्तैदी से काम करके करीब दस हज़ार चालान काटे और सिविल डिफेंस के आठ हज़ार लोगों ने दिल्ली के चौराहे-चौराहे पर खड़े होकर लोगों को जागरुक किया। इस ऑड इवेन फार्मूले ने ये भी साबित किया कि अगर कानून के बारे में सरकार जनता को भरोसे में ले। सरकारी विभागों में बेहतर और सख्त तालमेल बिठाए तो कानून को लागू करवाने में दिक्कत नहीं आती है।  

दिल्ली में फिर लागू होगा ऑड इवेन फार्मूला

आ़ड इवेन फार्मूला लागू होने के पहले दिन जब परिवहन मंत्री गोपाल राय डीटीसी की बस से दिल्ली का जायजा लेने निकले।
तो बीजेपी के मुख्यालय 24 अशोका रोड पर उनकी बस धीमी हुई। बीजेपी मुख्यालय के सामने खड़ी गाड़ियों के नंबर देखकर गोपाल राय भी हंसते बोले देखो बीजेपी इस फार्मूले की आलोचना तो कर रही है लेकिन कारों से आने वाले कार्यकर्ताओं ने इस फार्मूले को अपनाया है। यही वजह है कि ऑड इवेन फार्मूले की कामयाबी से सरकार का मनोबल बढ़ा है। दिल्ली वालों के फेफड़े को साफ रखने के लिए ये फार्मूला लागू किया गया था। लेकिन प्रदूषण से ज्यादा दिल्ली का ट्रैफिक आम दिनों की अपेक्षा करीब 30 फीसदी तक कम रहा। इससे लोग जाम से तो बचे ही साथ ही आने जाने में कम वक्त लगा। दस दिन पहले तक जो गोपाल राय इस फार्मूले को दोबारा लागू करने पर साफ जवाब देने से बचते थे वहीं मंत्री ऑड इवेन फार्मूले की समीक्षा के बाद जब मीडिया से मुखातिब हुए तो उन्होंने भरोसे के साथ कहा कि इसे दोबारा लागू किया जाएगा। लेकिन लागू करने से पहले हमें दो सवालों का जवाब खोजना होगा। पहला बच्चों के स्कूल खुलने के बाद जब हम ऑड इवेन फार्मूले को लागू करेंगे तो बच्चों को उनके माता या पिता कैसे छोड़ सकें और ला सके। इसके लिए या तो हम एक से तीन बजे तक छूट दें। दूसरा अगर इसे दोबारा लागू किया जाएगा तो लोगों का जोर पुरानी गाड़ियां खरीदने पर हो सकता है। इसका उपाय कैसे खोजा जाए।

क्या है ऑड इवेन फार्मूला

आड इवेन फार्मूला यानि सम विषण अंकगणित। गाड़ियों की नंबर प्लेट का आखिरी नंबर मसलन 0,2,4,6,8 जैसी सम नंबर की गाड़ियां इसी तारीख को चलेंगी। जबकि विषम नंबर की गाड़ियां मसलन 1,3,5,7,9 की तारीख को चलेंगे। दिल्ली में एक अंदाजे के 85 लाख गाड़ियां है इनमें से 19 लाख डीजल और पेट्रोल की कारें हैं। इस फार्मूले के लागू होने के बाद नौ लाख कारें अपने आप सड़कों से बाहर हो गई। हालांकि इसमें महिला ड्राईवरों, सीएनजी गाड़ियों को छूट देने की आलोचना भी हुई। सैकड़ों साल पहले रोमन सम्राज्य में ऑड इवेन फार्मूले पर अमल होने का इतिहास मिलता है। इसके बाद इसे मैक्सिको, बीजिंग और रोम जैसे शहरों में प्रदूषण को कम करने के लिए लागू किया गया। जो काफी सफल भी रहे हैं।
लेकिन हमारे यहां लोग हर समस्या के समाधान में दस समस्या निकालने में उस्ताद है। इसी के चलते इस फार्मूले को शुरुआती दौर में लागू करते वक्त बहुत सारे लोगों ने एक और कानून कहकर इसका मजाक भी उड़ाया। लेकिन अब इसकी कामयाबी उन शहरों के लिए भी एक नजीर है जो बढ़ते प्रदूषण के खतरे का सामना कर रहे हैं।

ऑड इवेन फार्मूले से इनको कोई फर्क नहीं पड़ा..

ऑड इवेन फार्मूला के तहत राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, केंद्रीय मंत्री,
जैसी डेढ़ दर्जन वीआईपी को छूट मिली थी। इसके दायरे में बाइक सवार, महिला चालक, विकलांग चालक या इमरजेंसी सेवाएं नहीं आती थी।

ऑड इवेन फार्मूले का प्रदूषण पर असर

दुनिया भर में दिल्ली पांचवा सर्वाधिक प्रदूषित शहर है। दिल्ली सरकार का दावा है कि प्रदूषण में 20 से 25 फीसदी की कमी आई है। बाहरी दिल्ली जहां पीएम 2.5 का स्तर 900 क्यूबिक स्कावायर मीटर रहता था ऑड इवेन लागू रहने के दौरान 600 क्यूबिक स्क्वायर मीटर तक रहा। लेकिन उसके बावजूद दिल्ली का प्रदूषण गंभीर का श्रेणी में आता है। आईआईटी कानपुर के रिसर्च में हैरान करने वाले आंकड़े आए हैं. इसके मुताबिक दिल्ली का प्रदूषण बढ़ाने में सबसे ज्यादा हाथ धूल का है। दिल्ली में धूल से करीब 38 फीसदी पीएम2.5 और 56 फीसदी पीएम 10 होता है। इसके बाद 33 फीसदी प्रदूषण दो पहिया वाहन और 46 फीसदी प्रदूषण ट्रकों के जरिए होता है। जबकि कारों से 10 फीसदी प्रदूषण ही होता है। शायद इसी के चलते ऑड इवेन फार्मूले का उतना असर प्रदूषण पर नहीं पड़ा। लेकिन अगली बार इसका दायरा दोपहिया वाहन और ट्रको तक बढ़ाए जाने के बाद इस प्रभाव जरुर दिखेगा।


रवीश रंजन शुक्ला

(लेखक एनडीटीवी इंडिया से जुड़े हैं)