Sunday, 10 April 2016

नानी का जाना...बहुत कुछ टूट जाना

नानी का जाना...बहुत कुछ टूट जाना

बहराईच अपने माता-पिता से मिलने का मलतब नाना-नानी के घर जाना भी है। बहराईच में सुबह तैयार होकर बाइक निकाली...अनमने तरीके से किक मारी..70 एमएम की एक पूरी 35 साला खामोश पिक्चर मेरे दीमाग में चल रही थी। मेरी बाइक काजीपुर मोहल्ले की संकरी गलियों में दाखिल हुई..पर जेहन इन पुरानी यादों के साथ मोहल्ले की इन गलियों में उस बचपने को भी खोज रहा था जो हर एक दरो-दीवार..जानें-पहचाने घरों के पलस्तर और चूने-सफेदी की पुरानी यादों में कहीं जुड़ा मिला तो कहीं उजड़ा मिल रहा था। मेरी बाइक गली के किनारे पर रुक गई..घर के ऊपर शांति भवन लिखा था दरवाजे पर धर्मदत्त पांडेय का पुराना बोर्ड लगा था।
दरवाजा खटखटाते ही वो अपने आप खुल गया। मैं बैठका के खुले दरवाजे से अंदर दाखिल हुआ...घर में अजीब सन्नाटा पसरा था..गौरय्या की आवाज जब तक इस सन्नाटे को तोड़ देती थी..बैठका से सटे कमरे में नीम अंधेरा छाया हुआ था...बेड पर बिना सिलवट की एक चादर करीने से बिछी थी,
बेड के सिरहाने की हमेशा बंद रहने वाली खिड़की का थोड़ा हिस्सा आज खुला हुआ था। उससे छनकर आने वाली आड़ी-तिरछी धूप मानो इस नीम अंधेरे को बीच से चीर दे रही हो। मेरी आंखे डबडबाने लगी थी इसी बेड पर आमतौर पर लेटी रहने वाली मेरी नानी..अक्सर मेरे आने की आहट पर जाग कर कहती...भय्या रवीश..दिल्ली से कब आए...चलो बैठो...मैं आती हूं। ये कहकर वो अपनी धोती का पल्लू सिर पर रखकर मेरे साथ उस कमरे से बाहर बरामदे तक आ जाती थी। उसी अनजानी आदत ने मुझे इस कमरे में रोक कुछ देर के लिए रोक सा लिया था। नानी के कमरे से बाहर निकल कर बरामदे में आ गया..वहां एक खाली पड़ी कुर्सी थी जिसपर अक्सर मेरी नानी बैठा करती थी..लेकिन मेरे आते ही वो उस कुर्सी पर मुझे बैठाकर खुद फर्श पर बैठ जाया करती थी। कुर्सी खाली थी..उसी से कुछ दूरी पर नीचे पानदान रखा था जिसमें रखे छोटे से सरौते पर नजर रुक गई। कई बार सरौते से डली काटते हुए वो मुझसे कहती थी..भय्या समय बड़ा बलवान होता है..उससे किसी ने मुकाबला करने की कोशिश कि वो खत्म हो गया...बातचीत करते हुए...वो बहू यानि मेरी मामी को बुलाती..एक सांस में कह जाती ...देखो भय्या आए हैं पहले चाय पिलाओ..फिर खाना खिलाओ...फिर मुझे देखते हुए बोलती...और भय्या दुलहन कैसी है...अचानक मेरी नजर पानदान से होते हुए बरामदे में लगी लाइट के स्विचबोर्ड पर चली गई...स्विचबोर्ड पर लगे एक छोटे से खरगोश के स्टिकर को देखकर आंखे और नम हो गई..25 साल पहले खराब हो चुके खिलौने से इस स्टिकर को निकालकर मैंने ही इस बोर्ड पर चिपका दिया था...जिससे जुड़ी यादें आज भी जेहन की किताब में भूली एक चिट जैसी चिपकी हुई है...तभी अचानक पीछे से मामी आई..अरे भय्या तुम कब आए...बैठका का दरवाजा खुला था क्या...मैंने बिना जवाब दिए..रुमाल निकाला और डबडबाई आंखों को फिर
पोंछा..चश्मा ठीक किया और नानी की कुर्सी पर बैठ गया..पानदान के पास नीचे फर्श पर मामी बैठ गई..वो कुछ थकी और बीमार सी लग रही थी..सिर नीचे करके धीरे से बोली...फिर भर्राई आवाज में बोलती ही चली गई...जैसे वो खुद से बात कर रही हो या उस पानदान को सुना रही हों.....भय्या नानी के मरने की खबर मिल गई थी..? दीपावली की छुट्टी पर जब तुम बहराईच से दिल्ली गए थे..उसी के हफ्ते भर बाद उनकी मौत हो गई थी..हम सब इसलिए तुम्हें खबर नहीं किए..कि तुम्हें इतनी जल्दी-जल्दी छुट्टी कहां मिलेगी...प्राइवेट नौकरी में हो..बेकार परेशान होगे...मैं एक टक आंगन में दाना चुग रही गौरय्या को देख रहा था...उसके शोर में मामी की आगे की बातें मानो गुम सी हो गई थी..आंखों के किनारे से पानी की एक धार गाल से होती हुई मेरी कलाई पर गिरी। नाना-नानी की अनगिनत यादें पुरानी बातें एक के बाद एक मेरे दिमाग में चल रही थी...सिर भारी हो रहा था..मैं तेजी से उठा और नानी के कमरे से होते हुए बैठका से बाहर निकल गया..बाइक पर किक मारी और काजीपुरा की उन उधेड़बुन वाली गलियों में गायब हो गया...
पौ फटने वाली थी...सूरज निकलने से पहले आसमान लाल हो चुका था। जागते हुए पत्नी बाहर छत पर आई..बोली अरे रात से यहीं बैठो हो...क्या हुआ। मैं बिना जवाब दिए बाथरूम में घुस गया और आंखे बंद करके जोर जोर से रोने लगा....

Monday, 18 January 2016

दिल्ली की जहरीली हवा को ऑड इवेन की कड़वी दवा



दिल्ली की जहरीली हवा को ऑड इवेन की कड़वी दवा

24 दिसंबर को अरविंद केजरीवाल के 3 फ्लैग स्टॉफ रोड के सरकारी बंगले पर गहमा-गहमी भरा माहौल था। मीडिया के दर्जनों कैमरे और पत्रकार दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के बंगले के बाहर बने पोटा केबिन में जमा हो चुके थे। सुबह के ग्यारह बजे अरविंद केजरीवाल अपने साथी मंत्री गोपाल राय और सतेंद्र जैन के साथ ऑड इवेन फार्मूले को लागू करने का ब्लू प्रिंट बताने लगे। ऑड इवेन फार्मूले के तहत केंद्रीय मंत्रियों और दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्रियों को छूट दिए जाने वाली लिस्ट पढ़ते हुए वे अचानक रुके और बोले कि मै खुद और हमारे मंत्री ऑड इवेन फार्मूले से छूट के दायरे में नहीं होंगे। हम खुद कार पूल करके दफ्तर जाएंगे। ऑड इवेन फार्मूले के तौर पर ये आम आदमी पार्टी की सरकार का खतरनाक हो रहे दिल्ली के प्रदूषण पर ये पहला बड़ा और करारा हमला था। हालांकि दिल्ली सरकार को जब महीना भर पहले दिल्ली डॉयलॉग कमीशन के जानकारों ने बाकायदा एक डेमो करके ये सुझाव दिया। तब खुद अरविंद केजरीवाल समेत कई मंत्रियों के मन में इसे लागू करने को लेकर कई सवाल उमड़ घुमड़ रहे थे। लेकिन टीवी और अखबारों में  जब सुबह बढ़ते प्रदूषण के आंकड़ों में आनंद विहार, पंजाबी बाग जैसे इलाके सुर्खियां बटोरते तो सरकार के माथे पर शिकन आना स्वाभाविक है। खुद अरविंद केजरीवाल कहते हैं कि जब बीमारी गंभीर हो तो कड़वी दवा पीने के लिए तैयार रहना चाहिए। वायु प्रदूषण से हर साल 10 हज़ार लोगों की जान गंवाने के बाद अब दिल्ली वालों को भी इसके खतरे का अंदेशा हो चुका है। इसी के चलते दूसरे राजनीतिक दलों की आलोचनाओं के बावजूद ऑड इवेन फार्मूले को ज्यादातर दिल्लीवालों का समर्थन मिला है। ये शायद पहली बार जब लोगों ने इस फार्मूले को कायदे कानून से ज्यादा खुद के सेहत से जुड़ा मसला मानकर इसका खुद से पालन किया। हालांकि इस दौरान दिल्ली ट्रैफिक पुलिस और ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट ने भी मुस्तैदी से काम करके करीब दस हज़ार चालान काटे और सिविल डिफेंस के आठ हज़ार लोगों ने दिल्ली के चौराहे-चौराहे पर खड़े होकर लोगों को जागरुक किया। इस ऑड इवेन फार्मूले ने ये भी साबित किया कि अगर कानून के बारे में सरकार जनता को भरोसे में ले। सरकारी विभागों में बेहतर और सख्त तालमेल बिठाए तो कानून को लागू करवाने में दिक्कत नहीं आती है।  

दिल्ली में फिर लागू होगा ऑड इवेन फार्मूला

आ़ड इवेन फार्मूला लागू होने के पहले दिन जब परिवहन मंत्री गोपाल राय डीटीसी की बस से दिल्ली का जायजा लेने निकले।
तो बीजेपी के मुख्यालय 24 अशोका रोड पर उनकी बस धीमी हुई। बीजेपी मुख्यालय के सामने खड़ी गाड़ियों के नंबर देखकर गोपाल राय भी हंसते बोले देखो बीजेपी इस फार्मूले की आलोचना तो कर रही है लेकिन कारों से आने वाले कार्यकर्ताओं ने इस फार्मूले को अपनाया है। यही वजह है कि ऑड इवेन फार्मूले की कामयाबी से सरकार का मनोबल बढ़ा है। दिल्ली वालों के फेफड़े को साफ रखने के लिए ये फार्मूला लागू किया गया था। लेकिन प्रदूषण से ज्यादा दिल्ली का ट्रैफिक आम दिनों की अपेक्षा करीब 30 फीसदी तक कम रहा। इससे लोग जाम से तो बचे ही साथ ही आने जाने में कम वक्त लगा। दस दिन पहले तक जो गोपाल राय इस फार्मूले को दोबारा लागू करने पर साफ जवाब देने से बचते थे वहीं मंत्री ऑड इवेन फार्मूले की समीक्षा के बाद जब मीडिया से मुखातिब हुए तो उन्होंने भरोसे के साथ कहा कि इसे दोबारा लागू किया जाएगा। लेकिन लागू करने से पहले हमें दो सवालों का जवाब खोजना होगा। पहला बच्चों के स्कूल खुलने के बाद जब हम ऑड इवेन फार्मूले को लागू करेंगे तो बच्चों को उनके माता या पिता कैसे छोड़ सकें और ला सके। इसके लिए या तो हम एक से तीन बजे तक छूट दें। दूसरा अगर इसे दोबारा लागू किया जाएगा तो लोगों का जोर पुरानी गाड़ियां खरीदने पर हो सकता है। इसका उपाय कैसे खोजा जाए।

क्या है ऑड इवेन फार्मूला

आड इवेन फार्मूला यानि सम विषण अंकगणित। गाड़ियों की नंबर प्लेट का आखिरी नंबर मसलन 0,2,4,6,8 जैसी सम नंबर की गाड़ियां इसी तारीख को चलेंगी। जबकि विषम नंबर की गाड़ियां मसलन 1,3,5,7,9 की तारीख को चलेंगे। दिल्ली में एक अंदाजे के 85 लाख गाड़ियां है इनमें से 19 लाख डीजल और पेट्रोल की कारें हैं। इस फार्मूले के लागू होने के बाद नौ लाख कारें अपने आप सड़कों से बाहर हो गई। हालांकि इसमें महिला ड्राईवरों, सीएनजी गाड़ियों को छूट देने की आलोचना भी हुई। सैकड़ों साल पहले रोमन सम्राज्य में ऑड इवेन फार्मूले पर अमल होने का इतिहास मिलता है। इसके बाद इसे मैक्सिको, बीजिंग और रोम जैसे शहरों में प्रदूषण को कम करने के लिए लागू किया गया। जो काफी सफल भी रहे हैं।
लेकिन हमारे यहां लोग हर समस्या के समाधान में दस समस्या निकालने में उस्ताद है। इसी के चलते इस फार्मूले को शुरुआती दौर में लागू करते वक्त बहुत सारे लोगों ने एक और कानून कहकर इसका मजाक भी उड़ाया। लेकिन अब इसकी कामयाबी उन शहरों के लिए भी एक नजीर है जो बढ़ते प्रदूषण के खतरे का सामना कर रहे हैं।

ऑड इवेन फार्मूले से इनको कोई फर्क नहीं पड़ा..

ऑड इवेन फार्मूला के तहत राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, केंद्रीय मंत्री,
जैसी डेढ़ दर्जन वीआईपी को छूट मिली थी। इसके दायरे में बाइक सवार, महिला चालक, विकलांग चालक या इमरजेंसी सेवाएं नहीं आती थी।

ऑड इवेन फार्मूले का प्रदूषण पर असर

दुनिया भर में दिल्ली पांचवा सर्वाधिक प्रदूषित शहर है। दिल्ली सरकार का दावा है कि प्रदूषण में 20 से 25 फीसदी की कमी आई है। बाहरी दिल्ली जहां पीएम 2.5 का स्तर 900 क्यूबिक स्कावायर मीटर रहता था ऑड इवेन लागू रहने के दौरान 600 क्यूबिक स्क्वायर मीटर तक रहा। लेकिन उसके बावजूद दिल्ली का प्रदूषण गंभीर का श्रेणी में आता है। आईआईटी कानपुर के रिसर्च में हैरान करने वाले आंकड़े आए हैं. इसके मुताबिक दिल्ली का प्रदूषण बढ़ाने में सबसे ज्यादा हाथ धूल का है। दिल्ली में धूल से करीब 38 फीसदी पीएम2.5 और 56 फीसदी पीएम 10 होता है। इसके बाद 33 फीसदी प्रदूषण दो पहिया वाहन और 46 फीसदी प्रदूषण ट्रकों के जरिए होता है। जबकि कारों से 10 फीसदी प्रदूषण ही होता है। शायद इसी के चलते ऑड इवेन फार्मूले का उतना असर प्रदूषण पर नहीं पड़ा। लेकिन अगली बार इसका दायरा दोपहिया वाहन और ट्रको तक बढ़ाए जाने के बाद इस प्रभाव जरुर दिखेगा।


रवीश रंजन शुक्ला

(लेखक एनडीटीवी इंडिया से जुड़े हैं)


Friday, 27 March 2015

राजनीतिक भक्ति की कट्टरता का दौर

मुझे व्यक्तित्व भक्ति से बहुत चिढ़ है खासतौर पर नेताओं की।
नेता को भगवान या खुदा मानकर आजकल समर्थक भक्त बनकर बड़ी तादात में चारण वंदना करना शुरू करतें हैं जिनमें आलोचना के लिए किंचित मात्र भी जगह नहीं होती है। ये राजनीतिक भक्ति के कट्टरवाद का दौर है।
इन भक्त को चार वर्गों में विभाजित करने की सोच रहा हूं। पहले नंबर पर वो राजनीतिक भक्त है जो पार्टी के सिद्धांतों के आधार उसके नेताओं की भक्ति करते हैं। वो राजनीतिक कार्यकर्ता कहलाते हैं। कुछ ऐसे भक्त है जो नेता को एक खास धार्मिक कट्टरता के समर्थन या विरोध करने के लिए पूजने या इबादत करने लगते हैं। ये तार्किक नहीं बल्कि धार्मिक सुरक्षा या असुरक्षा या खास पूर्वाग्रह से भक्त बन जाते हैं। तीसरी जमात में कुछ ऐसे कथित बुद्धिजीवी, पत्रकार, डाक्टर और वकील होते हैं जो तर्क की परिधि खींच कर नेता को जबरन उसके अंदर ले आते हैं और शुरू हो जाते हैं उसकी तारीफों के पुल बांधना। इनके अंदर एक राजनीतिक पहचान की आकांक्षा भी है जो अव्यक्त रूप में होती है। जिसकी परिणति चौंकाने वाली होती है। चौथी जमात उन मौसमी भक्तों की होती है जो तात्कालिक कारणों से किसी नेता की तारीफ कर भक्त बनते हैं और और वक्त बितने के साथ तात्कालिक कारणों या नफे-नुकसान का आंकलन कर उसे छोड़ भी देते है। ऐसे राजनीतिक होशियार वोटरों के चलते ही हमारा लोकतंत्र मजबूत बनता है। इसी चौथी और अंतिम जमात की वकालत करता हूं जिनके लिए मुद्दे मायने रखते हैं व्यक्ति नहीं।
मैं हमेशा दुनिया के उस बड़े राजनेता विसटन चर्चिल के वक्तव्य को याद रखता हूं उन्होंने कहा था कि लोकतंत्र में नेता का काम होता है लोगों को सपने दिखाना, लेकिन कोई जरुरी नही है कि वो पूरे ही होंगे। यानि आशावान बनिए, निराश नेता से हों लेकिन वक्त के साथ लोकतंत्र में फिर आस्था रखिए। भक्त नेता के नहीं लोकतंत्र के बनिए भला होगा।
इससे अलग एक बात लोगों की जिंदगी में ऐसे बहुत से लोग होतें है जिनसे वे प्रभावित रहते हैं। संकट की घड़ी या पेशेगत दुविधा के क्षणों में उनसे मार्गदर्शन की उम्मीद भी करते हैं। हम और आप उन दोस्तों और वरिष्ठ जनों से हद तक प्रभावित भी रहते हैं लेकिन ये भक्ति के दायरे में नहीं आता है हम तब अनजाने में भक्त बन जाते हैं जब हम उन्हें भी ईश्वर या खुदा मान लेने की भूल करते हैं।

Tuesday, 24 March 2015

singapore ex prime minister

क्यों भारत से नाराज रहते थे सिंगापुर के ली क्वान यू...

मेरी नजर में सिंगापुर के पूर्व प्रधानमंत्री ली क्वान यू इस दुनिया के शायद आखिरी लोकतांत्रिक तानाशाह नेता थे। जिन्हें पीपुल्स एक्शन पार्टी के नेता के तौर पर छह दशक तक लोगों ने चुना और लोकतांत्रिक तरीके से तानाशाही करने का मौका दिया। बदले में उन्होंने लोगों को कम बोलने, सीमित धार्मिक आजादी और बात बात में लोकतंत्र के चौथे खंबे को पकड़ने की आजादी लगभग न के बराबर दी। लोगों को मुंह बंद करके काम करने की आदत डलवाई उसके बदले में लोगों को शांतिपूर्ण तरीके से पश्चिम का वैभव और पूर्व के लजीज व्यंजनों का स्वाद मिला। उनके बारे में कुछ पढ़ने के बाद उनसे प्रभावित होने के बजाए मेरे मन में उनकी छवि एक ताकतवर लेकिन धूर्त नेता की बनी जो शायद कल की इंदिरा गांधी और आज के नरेंद्र मोदी के कुछ हद तक करीब है। जो दिखावे के लिए लोकतांत्रिक मूल्यों की दुहाई देते हुए कठोरता से अपने नव उदारवाद के मॉडल को लागू करवाना चाहते हैं। ली क्वान यू भारत को एक देश नहीं बल्कि ब्रिटेन की रेल लाइन के करीब बसने वाले 35 देशों का समूह कहा करते थे ।  
इसमें कोई शक नहीं है कि ली क्वान सिंगापुर की ही तरह समाजवाद और नवउदारवाद के एक अजीब घालमेल की पैदाईश थे। वो शायद इसलिए भी क्योंकि वो पैदाईशी चीनी थे और व्यवहारिक पूंजीवादी के कट्टर समर्थक ब्रिटेन की छत्रछाया में पले थे। वो जनता को समाजवादी अनुशासनात्मक तरीके से हांकते रहे और सिंगापुर का विकास पूंजीवादी तरीके से करते रहे। वो ऐसे पहले नेता थे जिन्होंने जनता को अनुशासित रखने के लिहाज से इंदिरा गांधी के इमरजेंसी लगाने का समर्थन किया था। उनका इस बात को लेकर खासा आग्रह रहता था कि भारत एक महान देश है लेकिन ये अपने को महान बनाने का अवसर तेजी से गंवा रहा है। वो भारत को पसंद करते थे, लेकिन नौकरशाही के व्यवस्थागत ढांचे को नफरत की हद तक नापसंद भी करते थे। उनका कहना था कि भारत के नौकरशाह अपने को सुविधा देने वाला नहीं बल्कि नियमों को लागू करवाने वाला मानते है। यहीं से संस्थागत ढ़ांचे में बुनियादी गलती शुरू होती है वो कहते हैं कि उद्योगपतियों के बारे में अच्छी सोच के बजाए किसी तरह पैसा ऐंठने की सोच ज्यादातर नौकरशाहों में रहती है। जो किसी भी देश के विकास की राह में एक बहुत बड़ा रोड़ा है। हालांकि बहुत सारे भारतीय ये जरुर आपको कहते मिल जाएंगे कि वो सिंगापुर के दमघोंटू अनुशासनात्मक जीवन के बजाए दिल्ली के प्रदूषित माहौल में अच्छा प्रदर्शन करना ज्यादा पसंद करते है। 
लेकिन हमें ये जरुर मानना पड़ेगा कि वो ये सारी बातें कहने के लिए इसलिए हकदार थे क्योंकि 1965 में ब्रिटेन से आजादी मिलने के बाद वो जिस झंझावात से अपने देश को निकाल कर एक चमचमाते वित्त बाजार में बना दिया था। जिसकी सुरक्षा करने के लिए उसके पास कोई भारी-भरकम सेना या सुरक्षा कवच नहीं है, ये अपने आप में हैरान करने वाला है। 
हमें उनसे राजनीतिक व्यवहारवाद के अनुशासन को कुछ हम तक सीखने की जरुरत है तभी लोकतांत्रिक मूल्यों को भीड़तंत्र के खतरों से बचाया जा सकता है। वरना हम इसी तरह संकीर्ण राजनीतिक सोच और बड़े खतरों की मनगढ़ंत कहानियों के बीच अपने देश की बदहाली का महज रोना तो रो सकते हैं लेकिन देश के विकास के लिए कठोर फैसला नहीं कर सकेंगे।    

Monday, 16 February 2015

media entry ban

मीडिया के कैमरों से कोफ्त जायज हक है

तुर्की में देशभर के पुलिस स्टेशन के अंदर मीडिया को जाने पर पाबंदी लगा दी गई थी, गाजा में इंटरनेशनल मीडिया को जाने की पाबंदी थी। इनके कारणों पर मैं नहीं जाऊंगा कई अच्छे हो सकते हैं कुछ खराब हो सकते हैं। ब
मैं ये नहीं कह रहा हूं कि दिल्ली सचिवालय में मीडिया के प्रवेश पर पाबंदी इतने बड़े मुद्दे हैं जिनका जिक्र मैने किया है। मीडिया के कैमरों से कोफ्त वाजिब भी है सवालों से सालभर तक परहेज आपका जायज हक है। अरविंद केजरीवाल का वो भाषण काबिले-तारीफ है जिसमें घमंड नहीं आने की बात कही गई थी। ये भी सच है कि पिछले साल जब अरविंद केजरीवाल शपथ लेकर दिल्ली सचिवालय पहुंचे थे और सैकड़ों कैमरे बदहवासी की हालत में उनके पीछे लगे थे। तब मुझे बहुत बुरा लगा था। गुस्सा आया अपने मीडिया के सहकर्मियों पर कि हम सभ्य तरीके से काम क्यों नहीं कर सकते हैं। सालभर बाद फिर अरविंद केजरीवाल भारी बहुमत से आए। जनता ने सवाल पूछने तक के लिए विपक्ष भी नहीं दिया ।लेकिन हम अपने तरीके में बदलाव करेंगे नहीं तो पाबंदी तो झेलनी ही पड़ेगी। शनिवार को मीडिया की इंट्री बैन थी नए मीडिया सलाहकार
नागेद्र शर्मा ने कहा कि सोमवार को कुछ रास्ता निकाल लिया जाएगा।
हम सड़कों से कवरेज और खबरों के लिए प्रेस नोट का इंतजार होने लगे। सोमवार शाम तक कई राउंड की बात हुई, सरकार को ये भी विकल्प दिया गया कि कैमरे से अगर दिक्कत है तो उसे मीडिया रुम तक ही सीमित कर दिया जाए। केवल मान्यता प्राप्त पत्रकार या
जिनके पास मान्यता नहीं है उन्हें पास बनवाकर जाने दिया जाए। लेकिन सरकार में असमंजस की स्थिति बनी रही। उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया जब
मीडिया रुम में आए तो कुछ पत्रकारों ने उनसे चीखकर मीडिया के इंट्री बैन पर सवाल पूछा और वो शालीनता से उठकर चले गए।
बाद में नागेंद्र शर्मा ने कहा कि उनके सबसे ताकतवार मंत्री के साथ दुर्व्यवहार हुआ। अब जैसे चल रहा है वैसे ही चलेगा मीडिया को इंट्री कतई नहीं देंगे। हमें जनता ने पांच साल के लिए जनादेश दिया है हम उसी के प्रति जवाबदेह रहेंगे जब वो मुझसे बात कर रहे थे तब मेरे जेहन में ब्रिटेन के एक नेता का बयान जेहन में घूम रहा था जब इराक पर हमले का मन अमेरीका और ब्रिटेन ने बनाया तब उसने इसे हूब्रिस सिंड्रोम नाम दिया था। जो बुश-ब्लेयर और शक्ति के नशे का गठजोड़ था।
सरकार को जनता के प्रति ही जवाब देह रहना चाहिए । वैसे भी मीडिया
किसी भी अच्छे काम के लिए नहीं जानी जाती है दलाली, मक्कारी और पेड न्यूज के लिए शायद ज्यादा बदनाम हो गई है। अरविंद केजरीवाल ने पिछले साल इस बात की तस्दीक करती हुई कई तकरीर भी जनता के बीच दी थी। नागेंद्र शर्मा आप ऐसे ही मीडिया पर पाबंदी रखे लेकिन शायद पत्रकारिता मंत्रियों के पास बैठकर चाय पीने, मोबाइल नंबर सेव कराने, हाथ मिलाकर धन्य होने या
एक्सक्लूसिव टिकटैक भर का नाम नही है हां ये बात अलग है कि हम इन्ही चश्मों से आज के पत्रकारों को ज्यादा देखते हैं।
लेकिन जैसे राजनीति में सादगी और ईमानदार के संकेत देकर आपने लोकतंत्र को मजबूत किया वैसे ही मीडिया के प्रवेश पर पाबंदी लगाकर आपने उन लोगों के हाथ में उस्तरा जरुर पकड़ा दिया जो सच्चाई की गर्दनें काटने के लिए कुख्यात रहे हैं।


Thursday, 1 January 2015

ये हैं दुनिया के सबसे गरीब राष्ट्रपति

ये हैं दुनिया के सबसे गरीब राष्ट्रपति

उन्हें गरीब राष्ट्रपति के बजाए साधारण कहलाना ज्यादा पसंद है।
उनके पास दरम्याना कद, बेढोल शरीर, चेहरे पर साधारण लेकिन सरल मुस्कान है।
वो तेरह साल जेल में बिता चुके हैं। और अपनी तनख्वाह की 90 फीसदी रकम दान दे देते हैं।
ये दुनिया के सबसे गरीब और विनम्र उराग्वे के राष्ट्रपति जोश मजुका है। उनके बारे में किसी अखबार में पढ़ रहा था।
जितना पढ़ता गया मेरी दिलचस्पी उतनी उनके व्यक्तित्व को जानने की बढ़ती गई।
उनके पास 90 के दशक की एक छोटी फोक्सवैगन बीटल कार है। जिससे वो राष्ट्रपति कार्यालय जाते हैं।
मेरे मन में कभी उनकी छवि के आसपास अरविंद केजरीवाल या ममता बनर्जी की कार घूमती।
तो कभी अमेरीका में नरेंद्र मोदी का नींबू पानी पीना घूमता है।
मैं सोच रहा था क्या इस तरह की सादगी और गरीबी के आसपास भी हमारे कोई नेता फटकते हैं।
जवाब गांधी जी के आसपास घूम रहा था..हमारी पीढ़ी ने जब होश संभाला तो मुझे याद है
जब वीपी सिंह ने प्रधानमंत्री पद संभाला तो वीआईपी कारों के काफिले को कम किया।
जो अखबार की सुर्खियां बनी। यही खबर दिल्ली से करीब 600 किमी दूर जब मेरे शहर
बहराईच के घर में पहुंची तो मैंने अपने पिता के चेहरे पर एक संतोष का भाव देखा था।
जो शायद ये अहसास दिलाता था कि हमारा देश एक जिम्मेदार हाथों में है।
पता नहीं क्यों सादगी में मुझे सकारात्मकता दिखती है।
वक्त बीतता गया अब मीडिया में हमारे नेताओं की वीआईपी कारों और बड़े घर की चर्चा होती है या आलोचना।
खैर उराग्वे के राष्ट्रपति जोश मजुका के बारे में आपको जानकारी देने के बजाए हम अपने देश के नेताओं की चर्चा
करने लगे जो इन सुविधाओं को जरुरत बताकर लेते हैं फिर सादगी का ढोल पीटते हैं।
जोश मजुका जब पांच साल के थे तो उनके गरीब किसान पिता दिवालिया होकर मर गए।
बचपन संघर्ष में बीता और बाद में क्यूबा की क्रांति से प्रभावित होकर ब्राड फ्रंट नाम का एक संगठन खड़ा किया।
सरकार से गोरिल्ला युद्धा शुरू करने वाले जोश मजुका 1970 में गिरफ्तार कर लिया गया।
लेकिन गिरफ्तारी से पहले सेना से उनका संघर्ष हुआ और उन्हें छह गोली लगी।
एक साधारण से डाक्टर ने उऩकी जान बचाई। इसके बाद उन्हें जेल में डाल दिया गया।
जेल से भी भागने की उन्होंने कोशिश की। 90 के दशक में जब उराग्वे में लोकतंत्र आया तो
उन्हें आजाद किया गया।
जोश मजुका ने लुशिया नाम की एक महिला से शादी की। जो गोरिल्ला युद्ध के दौरान उनके साथ लड़ी थी।
आजकल लुशिया भी सिनेटर है। उनके कोई बच्चे नहीं है..12000 डॉलर की सैलरी का 90 फीसदी दान कर देते हैं।
अपने छोटे से फार्म हाउस में अपनी पत्नी और तीन पैरों वाले एक कुत्ते के साथ रहते हैं। फूल उगाकर बेचते है
यही उनकी आमदनी का जरिया है। हालांकि जोश मजुका खुशकिस्मत है कि केवल साढ़े तीन मिलियन लोगों के एक छोटे
से देश के राष्ट्रपति है। लेकिन उनकी परांपरा से व्यवहारिक नीति बनाने की सोच का मैं कायल हूं।
ऐसे नेताओं और उद्योगपतियों के बारे में मेरा नजरिया सकारात्मक हो गया है
जिनमें सादगी और दान देने का इतना बड़ा दिल है। जोश मजुका की जिंदगी से सीख लेने की जरुरत
शायद उस समय ज्यादा पड़े जब चंद पैसों में ईमान खरीदने की कोशिश बहुत सारे लोग करने लगते हैं। 

Friday, 26 December 2014

mulayam ki bahu se mulaqat

एक मुलाकात मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू के साथ

कुछ वक्त पहले मैं यूपी सदन में ठहरे एक दोस्त से मिलने गया था..चाय पीने के दौरान दोस्त ने कहा
दीदी से मिलोगे..मैने आश्चर्य से पूछा. दीदी..उसने कहा मुलायम सिंह जी की छोटी बहू यहीं रुकी हैं।
मैने कहा बिल्कुल मिलूंगा..उनके बारे में ज्यादा नहीं जानता था..मोदी की तारीफ करने पर विवाद पैदा हुआ था..
इसी तरह की कुछ खबरें उनके बारे में पढ़ी थी और समाजवादी पार्टी का गाना आओ मिलकर देश बचाना है..
नेता जी को दिल्ली पहुंचाना है..इसको एक आध बार समाजवादी पार्टी के कार्यक्रम में सुन चुका था..उनसे मेरा परिचय बस
इसी के जरिए था..सुबह करीब 10 बज रहे थे..वो यूपी सदन के दूसरे माले के स्यूट में रुकी थी..
बाहर कुछ सुरक्षा कर्मी तैनात थे। मेरे दोस्त ने कहा जूता उतारना पड़ेगा क्योंकि छोटी बच्चा फर्श पर चलता है
इसके कारण दीदी भी जूता या चप्पल अंदर नहीं पहनती है।
मैं और मेरा दोस्त उस स्यूट के ड्राईंगरुमनुमा जगह पर बैठ गए..कमरे के अंदर से पूजा
करने की आवाज आ रही थी..मेरे जेहन में उप्र के सबसे ताकतवर राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखने वाली महिला
की कई छवि उमड़-घुमड़ रही थी। लेकिन पांच सात मिनट इंतजार करने के बाद जब वो आई तो उनके पैरों में चप्पल नहीं थी..
दरम्याना कद और सिम्पली ब्यूटीफुल। उनके बारे में बस अंग्रेजी का यही शब्द लिख सकता हूं। यूनिवर्सिटी आफ मैनचेस्टर
से इंटरनेशनल रिलेशन में मास्टर की डिग्री ले चुकी हैं। जरुरत के मुताबिक ही अंग्रेजी बोलने वाली ये महिला मुलायम की
छोटी बहू और प्रतीक यादव की पत्नी अपर्णा यादव हैं।  
छोटे से औपचारिक परिचय के बाद बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ..वो हर्ष एनजीओ की ब्रॉड अंबेसडर हैं
इसके जरुए महिलाओं के बीच में पुलिस और सिस्टम के बारे में जागरुकता फैलाने का काम करती है।
उन्होंने कहा उप्र इतना बड़ा है और सामाजिक काम करने का इतना स्कोप है कि जितना काम करो उतना कम है।
वो कहती है पुलिस को लेकर समाज में काफी डर है खासतौर पर महिलाएं थाने जाने से घबराती है..
मैं उन्हें इस बारे में लगातार जागरुक कर रही हूं कि अपनी समस्याओं को लेकर वो बेखौफ थाने जाए और
शिकायत करे। वो एक मोबाइल ऐप भी लॉंच करने की सोच रही है जिससे मुसीबत के समय महिलाएं तुरंत
सहायता के लिए पुलिस से संपर्क साथ सके।
इन सारे विषयों पर चर्चा करने के बाद मैने माहौल को हल्का करने के लिए पूछा..प्रतीक से आपकी मुलाकात कैसे हो गई।
वो हंस पड़ी बोली हां मै लोरेटो कान्वेंट में पढ़ती थी.प्रतीक सीएमएस में पढ़ते थे..
वो मुझसे दो साल बड़े हैं..मैं जब 9 वीं क्लास में थी प्रतीक 11 वीं में थे..
तब मेरी मुलाकात एक छोटी सी बर्थ डे पार्टी में उनसे हुई थी।
प्रतीक की मां यानि मेरी सासु मां को पता था कि मैं गाना अच्छा गाती हूं..
उसी गाने ने जिंदगी को एक शानदार मोड़ दे दिया..मैने पूछा वो कौन सा गाना था..
वो झेंपते हुए बोली देवदास फिल्म का ये सिलसिला है प्यार का..
ये कहते हुए वो हंसने लगी..कहने लगी इस गाने के बाद
प्रतीक के याहू मैसेनजर पर कई मैसेज आए..मैने सात दिन बाद
ये मैसेज पढ़े..इतना सुनते ही हम लोग हंसने लगे..
मैने कहा शुक्र है आज का दौर नहीं था...

राजनीति को ना..

राजनीतिक परिवार की बहू किस नेता की तारीफ करती है किसकी बुराई ये हमेशा से लोगों के लिए दिलचस्पी का
विषय रहा है। मुलायम सिंह के प्रति सम्मान और अखिलेश की तारीफ के कसीदे सुनकर मैं बोला
इन दोनों को छोड़कर कौन से नेता को आप पसंद करती है..क्या मोदी अच्छा काम कर रहे हैं..
वो झिझकते बोली मोदी का फिलहाल का काम अच्छा है..लेकिन बदलते वक्त में उनकी क्या छवि मेरे दिमाग होगी..
कहना मुश्किल है..लेकिन गांधी जी और अमेरिका का राष्ट्रपति जॉन एफ केनडी की मैं प्रशंसक हूं।
लेकिन मैं खुद राजनीति नहीं करना चाहती हूं.बस समाज के लिए अच्छा काम कर सकूं..इसी पर मेरा फोकस है..
भातखंडे संगीत विद्यालय से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ले चुकी अपर्णा यादव की मनपसंद ठुमरी..
अवध के नवाब वाजिद अली शाह की लिखी..बाबुल मोरा नईहय्यर छूटा जाए..
बातचीत के सिलसिले को आगे बढ़ाती वो कहती है आज का मीडिया जिम्मेदार नहीं है..
किसी बात पर रिसर्च नहीं करता है..मेरे पिता भी टाइम्स आफ इंडिया के संपादक रहे हैं..
वो दौर था जब पत्रकार रिसर्च करके पूरी जिम्मेदारी से खबर लिखते थे..
आज का पत्रकार क्या लिख दे..कुछ पता नहीं है..
मैं हंसा मैने कहा ये आरोप वाजिब भी है और जरुरी भी..
कुछ देर बातचीत के सिलसिले के बाद मैने मोबाइल में समय देखा..
फिर अपर्णा यादव को देखकर मैं उठ खड़ा हुआ..
मैने कहा मैम फिर मिलेंगे..मैं आपके मुलाकात का ब्यौरा ब्लॉग पर लिखूंगा
तो नाराज तो नहीं होंगी..बदले में वो सौम्यता से हंस पड़ी..