Friday, 26 December 2014

mulayam ki bahu se mulaqat

एक मुलाकात मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू के साथ

कुछ वक्त पहले मैं यूपी सदन में ठहरे एक दोस्त से मिलने गया था..चाय पीने के दौरान दोस्त ने कहा
दीदी से मिलोगे..मैने आश्चर्य से पूछा. दीदी..उसने कहा मुलायम सिंह जी की छोटी बहू यहीं रुकी हैं।
मैने कहा बिल्कुल मिलूंगा..उनके बारे में ज्यादा नहीं जानता था..मोदी की तारीफ करने पर विवाद पैदा हुआ था..
इसी तरह की कुछ खबरें उनके बारे में पढ़ी थी और समाजवादी पार्टी का गाना आओ मिलकर देश बचाना है..
नेता जी को दिल्ली पहुंचाना है..इसको एक आध बार समाजवादी पार्टी के कार्यक्रम में सुन चुका था..उनसे मेरा परिचय बस
इसी के जरिए था..सुबह करीब 10 बज रहे थे..वो यूपी सदन के दूसरे माले के स्यूट में रुकी थी..
बाहर कुछ सुरक्षा कर्मी तैनात थे। मेरे दोस्त ने कहा जूता उतारना पड़ेगा क्योंकि छोटी बच्चा फर्श पर चलता है
इसके कारण दीदी भी जूता या चप्पल अंदर नहीं पहनती है।
मैं और मेरा दोस्त उस स्यूट के ड्राईंगरुमनुमा जगह पर बैठ गए..कमरे के अंदर से पूजा
करने की आवाज आ रही थी..मेरे जेहन में उप्र के सबसे ताकतवर राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखने वाली महिला
की कई छवि उमड़-घुमड़ रही थी। लेकिन पांच सात मिनट इंतजार करने के बाद जब वो आई तो उनके पैरों में चप्पल नहीं थी..
दरम्याना कद और सिम्पली ब्यूटीफुल। उनके बारे में बस अंग्रेजी का यही शब्द लिख सकता हूं। यूनिवर्सिटी आफ मैनचेस्टर
से इंटरनेशनल रिलेशन में मास्टर की डिग्री ले चुकी हैं। जरुरत के मुताबिक ही अंग्रेजी बोलने वाली ये महिला मुलायम की
छोटी बहू और प्रतीक यादव की पत्नी अपर्णा यादव हैं।  
छोटे से औपचारिक परिचय के बाद बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ..वो हर्ष एनजीओ की ब्रॉड अंबेसडर हैं
इसके जरुए महिलाओं के बीच में पुलिस और सिस्टम के बारे में जागरुकता फैलाने का काम करती है।
उन्होंने कहा उप्र इतना बड़ा है और सामाजिक काम करने का इतना स्कोप है कि जितना काम करो उतना कम है।
वो कहती है पुलिस को लेकर समाज में काफी डर है खासतौर पर महिलाएं थाने जाने से घबराती है..
मैं उन्हें इस बारे में लगातार जागरुक कर रही हूं कि अपनी समस्याओं को लेकर वो बेखौफ थाने जाए और
शिकायत करे। वो एक मोबाइल ऐप भी लॉंच करने की सोच रही है जिससे मुसीबत के समय महिलाएं तुरंत
सहायता के लिए पुलिस से संपर्क साथ सके।
इन सारे विषयों पर चर्चा करने के बाद मैने माहौल को हल्का करने के लिए पूछा..प्रतीक से आपकी मुलाकात कैसे हो गई।
वो हंस पड़ी बोली हां मै लोरेटो कान्वेंट में पढ़ती थी.प्रतीक सीएमएस में पढ़ते थे..
वो मुझसे दो साल बड़े हैं..मैं जब 9 वीं क्लास में थी प्रतीक 11 वीं में थे..
तब मेरी मुलाकात एक छोटी सी बर्थ डे पार्टी में उनसे हुई थी।
प्रतीक की मां यानि मेरी सासु मां को पता था कि मैं गाना अच्छा गाती हूं..
उसी गाने ने जिंदगी को एक शानदार मोड़ दे दिया..मैने पूछा वो कौन सा गाना था..
वो झेंपते हुए बोली देवदास फिल्म का ये सिलसिला है प्यार का..
ये कहते हुए वो हंसने लगी..कहने लगी इस गाने के बाद
प्रतीक के याहू मैसेनजर पर कई मैसेज आए..मैने सात दिन बाद
ये मैसेज पढ़े..इतना सुनते ही हम लोग हंसने लगे..
मैने कहा शुक्र है आज का दौर नहीं था...

राजनीति को ना..

राजनीतिक परिवार की बहू किस नेता की तारीफ करती है किसकी बुराई ये हमेशा से लोगों के लिए दिलचस्पी का
विषय रहा है। मुलायम सिंह के प्रति सम्मान और अखिलेश की तारीफ के कसीदे सुनकर मैं बोला
इन दोनों को छोड़कर कौन से नेता को आप पसंद करती है..क्या मोदी अच्छा काम कर रहे हैं..
वो झिझकते बोली मोदी का फिलहाल का काम अच्छा है..लेकिन बदलते वक्त में उनकी क्या छवि मेरे दिमाग होगी..
कहना मुश्किल है..लेकिन गांधी जी और अमेरिका का राष्ट्रपति जॉन एफ केनडी की मैं प्रशंसक हूं।
लेकिन मैं खुद राजनीति नहीं करना चाहती हूं.बस समाज के लिए अच्छा काम कर सकूं..इसी पर मेरा फोकस है..
भातखंडे संगीत विद्यालय से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ले चुकी अपर्णा यादव की मनपसंद ठुमरी..
अवध के नवाब वाजिद अली शाह की लिखी..बाबुल मोरा नईहय्यर छूटा जाए..
बातचीत के सिलसिले को आगे बढ़ाती वो कहती है आज का मीडिया जिम्मेदार नहीं है..
किसी बात पर रिसर्च नहीं करता है..मेरे पिता भी टाइम्स आफ इंडिया के संपादक रहे हैं..
वो दौर था जब पत्रकार रिसर्च करके पूरी जिम्मेदारी से खबर लिखते थे..
आज का पत्रकार क्या लिख दे..कुछ पता नहीं है..
मैं हंसा मैने कहा ये आरोप वाजिब भी है और जरुरी भी..
कुछ देर बातचीत के सिलसिले के बाद मैने मोबाइल में समय देखा..
फिर अपर्णा यादव को देखकर मैं उठ खड़ा हुआ..
मैने कहा मैम फिर मिलेंगे..मैं आपके मुलाकात का ब्यौरा ब्लॉग पर लिखूंगा
तो नाराज तो नहीं होंगी..बदले में वो सौम्यता से हंस पड़ी..

Tuesday, 4 November 2014

http://khabar.ndtv.com/news/india/questions-on-bawana-mahapanchayat-689007

Monday, 13 October 2014

love jehad

राजनीतिक फायनेंस से बने लव जेहाद में नया मोड़

गंदी सी कमीज में नजरें नीची करके 55 साल का अधेड़ शख्श
मेरठ की कचेहरी में गुमसुम बैठा था। उसके सामने ठंडी हो चुकी चाय पर मक्खियां अब भी भिनभिना रही थी।
मानो वो अंदर से टूटा हुआ था और मेरी हिम्मत उससे
सवाल जवाब करने की नहीं हो रही थी । उसके बगल में बैठी वकील चेतना शर्मा लगातार
एक के बाद हमले पुलिस पर किए जा रही थी। ये उसी पीड़ित लड़की के पिता है
जिसने इसी साल 2 अगस्त को रेप और जबरन धर्म परिवर्तन का आरोप दूसरे सांप्रदाय के
कुछ लोगों पर लगाया था। इसी आरोप की बोतल से लव जेहाद का जिन्नाद निकला था। और देखते ही देखते
इसने कुछ नेता के हुक्म पर इसे एक बड़े राजनीतिक बखेड़े में बदल दिया था। इसी केस में पुलिस ने 9 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया था।
और वो सभी जेल की सलाखों के पीछे है।
लेकिन रविवार दोपहर पीड़ित लड़की अपने गांव खरखौंदा से भाग कर
20 किमी दूर मेरठ के महिला थाने पहुंची। उसने कहा कि उसकी जान को अपने ही परिवारवालों से खतरा है।
और वो अपनी मर्जी से कलीम नाम के लड़के के साथ गई थी। परिवार के दबाव में आकर उसने रेप का मामला दर्ज कराया था।
अब उसी लड़की का पिता कचेहरी में बैठा वकीलों से कानूनी राय ले रहा है।पिता का कहना है कि सद्दाम नाम का लड़का
उसे जबरन महिला पुलिस थाने में लाकर ये बयान दिलवाया है। गांव के कुछ लोग जो लड़की और उसके परिवार
के रहनुमा बने थे..अब इस पिता पर लड़की को न संभाल पाने का आरोप लगा सामाजिक बहिष्कार तक की धमकी दे रहे हैं।
इस पिता के सामने एक तरफ लड़की के चलते सामाजिक बदनामी और दूसरी तरफ कोर्ट कचेहरी तमाम राजनीतिक फायनेंसरों का दबाव।
राजनीति और जांच की गुत्थी में पीड़ित लड़की और उसका परिवार उलझकर रह गया है।

रेप की बुनियाद पर राजनीतिक महत्वांकाक्षा

पीड़ित लड़की के अब तक तीन बयान हुए हैं। पहला पुलिस के सामने दूसरा मजिस्ट्रेट के सामने
तीसरा रविवार को पुलिस और सिटी मजिस्ट्रेट को दिया गया ताजा बयान। तीनों बयानों में कई झोल है।
हालांकि इस ताजा बयान से इस केस के ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है अगर लड़की इसी बयान को
कोर्ट में देती है। तो जाहिरतौर पर केस कमजोर पड़ेगा। लेकिन पीड़ित लड़की से रेप के मामले में बंद कलीम
के साथ वो खुद अपनी मर्जी से गई थी। वो उसका प्रेमी है इस बात का जिक्र उसने अपने हालिया के बयान में किया है।
पीड़ित लड़की ने ये भी कहा कि अभी इस मामले से जुड़ी और सच्चाई सामने आना बाकी है। लेकिन ये तय हैं कि
गांव की प्रधानी से लेकर सूबे की राजनीति करने के लिए इसे हथियार के तौर पर प्रयोग किया गया है। मेरठ के एसएसपी ओंकार सिंह
कहते हैं कि मामला अदालत में है अभी रेप या जबरन धर्म परिवर्त हुआ इस बारे में कुछ कहना मुश्किल है। लेकिन जरा सोचिए कि
आप अगर इस लड़की के पिता होते है तो ऐसे हालात में क्या करते...अब अगले चुनाव तक ये किसी के लिए मुद्दा नहीं होगा। उन लोगों
के लिए भी जिन्होंने परिवार आर्थिक और सामाजिक मदद देने की बात कही थी।
लेकिन इसमें एक लड़की का भविष्य और पिता का पूरा परिवार जरूर
तहस नहस हो गया है जो अपने बच्चों के सपनों को पूरा करने के लिए मेरठ से दिल्ली मेहनत मजदूरी करने जाता था।







merath se lautkar

http://khabar.ndtv.com/news/india/love-jihad-why-girl-retracted-from-statement-what-is-the-issue-679071

Sunday, 14 September 2014

du election

अच्छे संकेत देती दिल्ली की छात्र राजनीति
दिल्ली विश्वविद्यालय में चारों सीटे बीजेपी की स्टूडेंट विंग एबीवीपी ने बड़े अंतर से जीता। एनएसयूआई को दूसरे नंबर पर रहकर संतोष करना पड़ा।
लेकिन वहीं जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में चार सीटें आईसा ने जीता..यहां दूसरे नंबर के लिए एबीवीपी और प्रोग्रेसिव लेफ्ट फ्रंट के बीच मुकाबला रहा।
देश में सबसे प्रतिष्ठित माने जाने वाले इन दोनों विश्वविद्यालय में छात्र संगठनों की सक्रियता, बिना किसी बवाल के चुनाव का होना, भविष्य के अच्छे राजनीतिक
संस्कार की ओर इशारा भी करती है। दिल्ली के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की छात्र राजनीति के लिए ये साल बड़े बदलाव का गवाह भी बना।
अपनी अंग्रेजियत और इलीटीसिज्म के लिए मशहूर सेंट स्टीफेंस कालेज में हिंदीभाषी रोहित कुमार यादव का प्रेसीडेंट बनना भी इसी के तरफ इशारा करता है।
18 साल बाद जीती एबीवीपी 
भारी सुरक्षा बंदोबस्त के बीच शनिवार को दिल्ली पुलिस लाइन में दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनाव की काउंटिंग हो रही थी।
इक्का-दुक्का छात्र नेताओं और मीडियाकर्मियों के सुगबुगाहट के अलावा शांतिपूर्ण तरीके से तीन घंटे तक मतो की गणना हुई।
एक लाख से ज्यादा छात्रों वाले दिल्ली विश्वविद्यालय के 28 उम्मीदवारों में चार का चुनाव करने के लिए 50 हजार छात्रों ने अपने मतों का प्रयोग किया।
जब रिजल्ट आए तो पता चला कि 18 साल बाद एबीवीपी के चारों उम्मीदवारों ने जीत हासिल की। अध्यक्ष पद पर मोहित नागर को 20718 वोट मिले जबकि एनएसयूआई के गौरव तुसीर को 19804 वोट
उपाध्यक्ष पद पर परवेश मलिक, सचिव पद पर कनिका शेखावत और संयुक्त सचिव पद पर आशुतोष माथुर ने सर्वाधिक मतों से जीत हासिल की। 
कभी एनएसयूआई का गढ़ रहा दिल्ली विश्वविद्यालय अब उसके हाथों से निकलता दिखाई दे रहा है। इस बार आईसा ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।
लेकिन उसे अभी लंबा सफर तय करना है।
जेएनयू में आईसा का ढंका बजा
एक दिन बाद यानि रविवार को जवाहर लाल नेहरू छात्र संघ चुनाव में आईसा ने सबका सूपड़ा साफ कर दिया।
चारों सीटों पर इनके उम्मीदवार ने जीत हासिल की। इस चुनाव में एबीवीपी और लेफ्ट प्रोग्रेसिव फ्रंट ने भी अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराई है।
जेएनयू में प्रेसीडेंट आईसा के आशुतोष जीते जिन्हें 1386 वोट मिले। जबकि वीइस प्रेसीडेंट पद अनंत, जनरल सेक्रेटरी पद पर चिंटू और ज्वाइंट सेक्टरी पद पर
जेएस शफाकत ने जीत हासिल की। इस चुनाव में वाइस प्रेसीडेंट और जनरल सेक्रेटरी पद पर एबीवीपी दूसरे नंबर पर रही है..जबकि दो अन्य पोस्टों पर लेफ्ट प्रोग्रेसिव फ्रंट दूसरे नंबर पर रहा।
हालांकि इस बार आईसा के पूर्व प्रेसीडेंट अकबर चौधरी पर लगे यौन उत्पीड़न के आऱोपों को दूसरे छात्र संगठनों ने मुद्दा बनाया था।
लेकिन उसके बावजूद आईसा की धमक जेएनयू में कम नहीं हुई बल्कि और मजबूती के साथ वो उभरा।
हालांकि दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में इस बार छपे पम्फलेट का प्रयोग खूब हुआ..कुछ लोगों ने छात्रनेताओं पर आपराधिक मुकदमें दर्ज होने की बात भी उठाई।
लेकिन इनको अगर छोड़ दे तो छात्र संघ चुनाव का अच्छे तरीके से होना और अच्छे छात्र नेताओं का चुना जाना, ऐसी बातें है जो राजनीतिक परीक्षण में सफलता की गारंटी देती नज़र आती है।

Thursday, 4 September 2014

documentary

http://khabar.ndtv.com/video/show/documentary-ndtv-india/16-235637

Monday, 25 August 2014

संजीव चतुर्वेदी की खबर..

https://www.youtube.com/watch?v=6gASf3Inxh0

मेरी पोखरा यात्रा



वो एक

शाम थी जब हम दोस्तों ने मिलकर पोखरा जाने की सोची। पोखरा में मेरे दोस्त नीरज मल्होत्रा का होटल था। उन्होंने भी काफी पोखरा जाकर घूमने के लिए उत्साहित किया। बहराईच से गोंडा के लिए सुबह ट्रेन पकड़ी..लेकिन जिन तीन दोस्तों ने जाने की बात कही थी। सुबह सुबह होते होते उनके साथ चलने की योजना खटाई में पड़ती दिखी..मैने सभी दोस्तों को एक मेसेज करके घर से निकल पड़ा। पयागपुर पहुंचते ही मेरे दोस्त महेद्र का फोन आया कि अकेले जा रहे हो..मैने गुस्से से कहा बिल्कुल..वो बोला इसी स्टेशन पर उतर जाओ मैं आ रहा हूं...
करीब 30 घंटे बाद वो डग्गामार जीप पर सवार होता हुआ पयागपुर पहुचा..मैं भी उस जीप में बैठ गया..10 बजे गोंडा से गोरखपुर के लिए तूफान एक्सप्रेस पकड़ी...और जब हम दोनों बस्ती पहुंच रहे थे ..तभी दो ्न्य दोस्त बलवंत और राजा का फोन आया..उन्होंने कहा कि गोरखपुर रुकों हम आ रहे हैं..दोपहर में हम गोरखपुर पहुंच गए लेकिन दो दोस्त शाम करीब 5 बजे वहां पहुंचे। हम एक कार लेकर सुनौली बोर्डर करीब 7 बजे तक पहुंचे।
10 बजे तक सुनौली बार्डर पर भारत और नेपाल की सीमा बंद हो जाती है। लेकिन हम साढ़े आठ बजे तक नेपाल के भैरवा जिले में पहुंच गए। वहां से एक ट्रैवेल एजेंसी की कार हमने 17 सौ नेपाली रुपए में हमने तय किया। एक सजी धजी सैंट्रो कार के अंदर नीली बत्ती जल रही थी..इसे एक नवजवान लड़का साफ कर रहा था। हमने पूछा तम्ही चलोगे क्या उसने कहा जी साब..रात करीब साढ़े नौ बजे हमारी यात्रा कार से भैरवा जिले से पोखरा की शुरू हुई। यहां से करीब साढ़े तीन सौ किमी पोखरा है। रातभर पहाड़ों के घुमावदार रास्तों से होते हुए करीब 4 बजे हम पोखरा जिले की सीमा में दाखिल होने लगा। ऐसा लगा कि बादलों और पहाड़ों से ढका कोई बड़ा से कटोरा रखा हो..खूबसूरत शहर प्राकृतिक संसोधनों से भरपूर सांस लेने पर लगा फेफड़ों के अंदर एक नम और ताजा हवा घुस रही हो...पोखरा का नाम एक तालाब से पड़ा। नेपाल में तालाब को लोग पोखरा बोलते हैं..शहर के बीचोबीच एक पड़ी सी झील है जिसके ईर्दगिर्द ये शहर बसा है...होटल कंफर्ट इन में हमारा कमरा पहले से बुक था..वहां के मैनेजर युबराज आचार्य बहुत सहयोगी और सपाट बोलने वाले शख्श है। हमने थोड़ी देर आराम किया..फिर दोपहर 12 बजे मैं सेविंग कराने नीचे गया..पता चला उस दुकान का नार् भी बिहार से आया था..बीते 15 साल से पोखरा में रह रहा था..यही स्थानीय लड़की से शादी करके बस गया था।

शेष फिर

mali ka beta

http://khabar.ndtv.com/news/india/gardeners-son-is-st-stephens-union-chief-652960

Saturday, 16 August 2014

बाढ़ ने मचाई तबाही
नेपाल के पानी से यूपी के तराई में तबाही
नेपाल के अलग-अलग बैराज से छोड़े गए 10 लाख क्यूसेक पानी ने उप्र के तराई में भारी तबाही मचा दी है।
बहराईच में घाघरा और श्रावस्ती की राप्ती नदी उफान पर है। इन दोनों ही जिलों में करीब 400 से ज्यादा गांव में पानी भर गया है
और हजारों हेक्टेयर खेत पानी में डूब गए। इन दोनों ही जिलों में 100 से ज्यादा लोग लापता और 2 लाख से ज्यादा आबादी इस बाढ़ से प्रभावित हैं। नेपाल से छोड़ा गया पानी इतनी तेजी से इन जिलों में आया
कि जानबचाकर भाग रहे कई लोग पानी में बह गए। शुक्रवार रात को बहराईच के महसी तहसील में घाघरा नदी का पानी घुसने लगा।
पिपरी गांव के पेशकार यादव रात में अपना सामना लादकर जैसे ही सुरक्षित जगह जाने लगे। इनकी बेटी रामप्यारी और बेटा देवकी
गहरे पानी में जा गिरे। पानी उनकी लाश झाड़ियों में फंसी मिली।
राप्ती और घाघरा का कहर
आमतौर सामान्य सी नदी की तरह बहने वाली राप्ती नदीं खतरे के निशान से 10 मीटर ऊपर बह रही है। ये नदी नेपाल के चितवन घाटी से निकलती है।
नेपाल में भारी बारिश और बादल फटने के चलते राप्ती नदी में अचानक बाढ़ आ गई। श्रावस्ती जिले में नदी का पानी करीब 200 से ज्यादा गांव में भर गया है।
बहराईच-श्रावस्ती 4 लेन सड़क के ऊपर से नदी का पानी बह रहा है। 200 मीटर तक सड़क पूरी तरह गायब हो गई है। जिसके चलते श्रावस्ती दूसरे जिलों से कट गया है।
यही नदी बाद में घाघरा नदीं में मिल जाती है। घाघरा नदीं ने बहराईच के महसी, मिहींपुरवा, नानपारा तहसील में भयानक तबाही मचाई है। नदी का जलस्तर अगर बढ़ा तो
बहराईच-लखनऊ राजमार्ग को भी बंद किया जा सकता है। घाघरा नदी ने कई गांवों का अस्तित्व लगभग खत्म कर दिया है। गोंडा से बहराईच ब्रॉड गेज की रेलवे लाइन बाढ़ की वजह से
बंद कर दी गई है।
बाढ़ के लिए कोई चेतावनी नहीं
हर साल नेपाल में छोड़े गए पानी से उप्र के तराई जिलों में बाढ़ आती है। लेकिन अब तक कोई ऐसी हल नहीं खोजा जा सका है।
ताकि पानी छोड़े जाने से पहले इन जिलों के अधिकारी इसके बचाव के लिए कदम उठा पाए। बहराईच के डीएम कहते हैं कि नेपाल के करनाली नदी में पानी बढ़ने से
बाढ़ आई। लेकिन इसकी पहले से सूचना नहीं दी गई। सवाल ये उठता है कि हर साल इस तरह की बाढ़ के बावजूद क्यों इसका समाधान नहीं खोजा गया।
खबर है कि नेपाल की तरफ से आने वाली करनाली नदीं का पानी कार्तिनिया घाट सेंचुरी में घुस गया। बहुत सारे जंगली जानवरों के मारे जाने से आशंका है।
यहां से सटे मिहीपुरवा इलाके के कई गांव पानी से घिरे हैं। नावों की कमी के चलते बहुत सारे लोगों को उनके घरों से नहीं निकाला जा सका है। धुसुवा के वीरेंद्र प्रताप सिंह
कॉलेज के प्राचार्य विवेक प्रताप सिंह बताते हैं कि श्रावस्ती के रास्ते कटे होने के चलते राहत का सामान और बचाव कर्मी भी नहीं पहुंच पा रहे हैं। श्रावस्ती जिले के ज्यादातर
सरकारी दफ्तरों में पानी भरा है। आने वाले समय में स्वास्थ्य महकमा को भी मुस्तैद होना पड़ेगा क्योंकि बाढ़ के उतरते पानी से डायरिया का बड़ा संकट जिले में मंडरा रहा है।


Thursday, 14 August 2014

आजाद भारत के गुलाम मुद्दे

आजाद भारत के गुलाम मुद्दे
मोदी जी 15 अगस्त के दिन भी बड़ी बड़ी बातें करेंगे। मुझे पूरी उम्मीद है।
लेकिन इन्हें पूरा करने के लिए आपके पास पूरे पांच साल और भारी बहुमत की एक बड़ी टीम है।
आपका समय अब से शुरू होता है।
अगर आपने काम नहीं पूरे किए तो इतिहास आपको उसी तरह बड़बोलेपन के लिए
याद करेगा जैसा मनमोहन सिंह को अतिचुप्पी के लिए याद करता है।
खैर हम अपने गिरेबां में भी झांके..हर मसले पर अपने अधिकार की याद दिलाते
हम खूब नेताओं और नौकरशाहों की लानत मिलानत करते हैं।
लेकिन हम दुनिया में सबसे बड़े झूठे, सबसे बड़े फ्राडिए,
खुद को होशियार समझने की बेवकूफी
,कहीं भी थूकने और मूतने के लिए जाने जाते हैं।
हम पहले हिंदू है जो मुसलमान और दूसरे धर्मों को देखना नहीं पसंद करते हैं।
लेकिन जब हमारी सत्ता थी तब हम गरीबों और दलितों
के लिए बेरहमी से मंदिरों के दरवाजे बंद कर रहे थे। ना हमने उन्हें सम्मान दिया ना लड़ने का अधिकार
दिया और ना ही प्रेम से साथ बैठने को कहा। जानवरों को पूज्यनीय माना लेकिन
आदमियों को उनसे बत्तर समझा। अगर हम इसी मानसिकता से आगे बढ़ते रहे मेरे भाईयों तो शायद
सच्ची आजादी केवल भावनात्मक नारों और गानों में ही हम मनाते रहेंगे। दुनिया में सिर्फ दो धर्म है
एक अमीर का दूसरा गरीब का। ज्यादा मंदिर या मस्जिद बनवाकर, ज्यादा बच्चे पैदा करके
ज्यादा धर्मांतरण करवा कर, दूसरे धर्मों के लोगों को मार कर कोई धर्म आगे नहीं बढ़ा है
अगर ऐसा होता तो जहां केवल मुसलमान है या सिर्फ हिंदू या सिर्फ क्रिश्चयन वाले देशों में दंगे फसाद
और नफरत होती ही नहीं। सड़क पर मंदिर या मस्जिद बनवाकर हम ऊपरवाले को अपने जैसे बेईमान
बनाने पर तुले है। लेकिन जब तक हम दूसरों का सम्मान नहीं करेंगे तब तक दुनिया में अगर एक धर्म के लोग आ भी जाए
तो मार काट चलती रहेगी, जैसी चल रही है। मुझे अपने देश से बड़ी उम्मीद है, 60 साल पहले भले हमने दुनिया को
एक मोमबत्ती भी नहीं दी। लेकिन आज हमने होमी जहांगीर भाभा की परमाणु थ्योरी, भटनागर-माथुर मैग्नेटिक इंटरफेयरेंस थ्योरी
बोस-आइंसस्टीन स्टैटिक्स दी। नई पीढ़ी के लोग देश और विदेश में नाम रोशन कर रहे हैं। दुनिया अब हमारे टैलेंट से डरने लगी है।
हम अपने टैंलेंट को इसी तरह मानवता के काम में लगाते रहेंगे..इन्ही शब्दों के साथ जयहिंद

Sunday, 3 August 2014

श्रावस्ती का चुनाव

गौतम बुद्ध की नगरी श्रावस्ती के मुख्यालय भिन्गा से 40 किमी दूर सेमरहना के छोटे से गांव में टाटा फाचूर्नर से लेकर सफारी तक घूल से लस्त पस्त रंग बिरंगे झंडे लगाए घूम रही है..हां..नेताओं के पीछे तो आदमी नहीं है लेकिन इन गाड़ियों के पीछे फटी बनियान और बिना नेकर के छोटे बच्चों का हूजूम जरुर है। .आम के बगिया में गाड़ी रुकने के साथ ही धूल की एक आंधी हमारे सर से निकल गई। गांव में हल्ला हुआ..नेयता आए है बहुत बड़े गुंडे रहे हैं..इलाहाबाद के..सबसे पहले यही परिचय उनके लगुवा भगुवा नेता न...े हमारे चाचा के कान में फुसफुसाकर दिया। उनके चेहरे पर काली मूंछो का स्याह फैलावट..ओंटों पर दबंग मुस्कान..गले लगाने की नई आदत से गुलजार समाजवादी पार्टी के माफिया डॉन अतीक अहमद राजनीतिक दीक्षा लेने के लिए हमारे गांव की धूल फांक रहे हैं..यहां से 90किलो मीटर दूर बहराईच में कैसरगंज से माफिया ब्रजभूषण सिंह मुलायम सिंह का पहले नाम जप रहे थे इस बार मोदी की ताजपोसी का बहाना लेकर वोटरों को लुभाने में लगे हैं..हमारा जिला आजकल राजनीतिक कचराघर बन गया है..कैसरगंज से चार बार सांसद रह चुके बेनी प्रसाद वर्मा से लेकर निवर्तमान सांसद ब्रजभूषण सिंह ने लोगों को निराश करने के अलावा कुछ नहीं किया है। करीब 49 फीसदी साक्षरता दर वाला श्रावस्ती अति पिछड़े शहरों में आता है भारत सरकार इसे फंड भी देती है लेकिन ये फंड कहां से आता है और कहां चला जाता है कुछ पता नहीं..पिछली बार यहां से कांग्रेस के सांसद विनय कुमार पांडेय थे..क्षेत्र में जाने से ज्यादा ये टीवी डिबेट में आते थे..मेरी भी पहली मुलाकात इनसे एनडीटीवी के दफ्तर में ही हुई थी...माना जाता है कि गौतम बुद्ध ने इस शहर में 24 चतुर्मास किया था..कई एतिहासिक धरोहरे मसलन डाकू अंगुलीमार की गुफा, बौद्ध स्तूप भी है..लेकिन अतीक अहमद और रिजवान जहीर जैसे आपराधिक औजारों से लैस लोग यहां से नेता बनने की फिराक में है। ..मैं जानता हूं कि श्रावस्ती जैसे शहरों में रहने वाले सीधे मेहनती लोगों को बेवकूफ बनाकर जाति धर्म के आधार पर वोट कराना सबसे आसान है.... ये इसी पर वोट करेंगे भी।लेकिन फिर भी मेरे जैसे बाशिंदे निराश नहीं है..राहत इंदौरी का शेर हिम्मत पैदा करता है..
.खुष्क दरियाओ में हल्की सी रवानी और है, रेत के नीचे अभी थोड़ा सा पानी और है,
जो भी मिलता है उसे अपना समझ लेता हूं मैं, एक बीमारी मुझे ये खानदारी और है..

(लेखक के अपने निजी विचार है..इनका किसी पार्टी से कोई लेना देना नहीं है)

Wednesday, 30 July 2014

http://khabar.ndtv.com/video/show/khabron-ki-khabar/331892


http://khabar.ndtv.com/news/india/saharanpur-riots-victims-recall-pakistan-596294


दंगा पीड़ितों को पाकिस्तान याद आया

सहारनपुर के दंगा पीड़ितों को पाकिस्तान याद आया

सहारनपुर की  गंगा-जमुनी तहजीब को 26 जुलाई यानि शनिवार को बलवाईयों ने तार-तार कर दिया।
दंगाईयों ने सुबह 7 बजे से जो दुकान जलाने और लूटने का सिलसिला शुरू किया तो दोपहर 12 बजे तक चलता रहा।
कुतुबशेर इलाके में महज 40 पुलिसवाले 3 हज़ार की हिंसक भीड़ से जूझते रहे ,
इस दौरान किसी ने कांस्टेबल की पीठ पर भी गोली मार दी। कुल तीन लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी।
38 से ज्यादा लोग घायल हो गए और 100 से ज्यादा दुकानों में आग लगा दी गई। 
शुरूआती जांच में पता चला है कि इस दंगे में तीन दर्जन गाड़ियां और 50 करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान हुआ है।
बलवाईयों के हमले का सबसे पहला शिकार सहारनपुर का फायर स्टेशन हुआ। इसी के चलते 
शनिवार सुबह से दुकानों में लगी आग रविवार शाम तक सुलगती रही। जबकि आग बुझाने की गाड़ियां देहरादून से लेकर नोएडा
तक से आई हुई थी।

60 बाद जख्म फिर हरे हुए

सरकार ने आजादी के बाद पाकिस्तान से आए हजारों शरणार्थियों को सहारनपुर के नुमाईश कैंप
में घर दिया। इसी इलाके का एक घर दंगों में मार दिए गए 56 साल के हरीश कोचर का भी है। 
परिवार में अब 12 साल की बेटी और पत्नी बची है। 
घर के बाहर उनके 70 साल के भाई मोहन कोचर बैठे है।
मीडिया को देखते ही फफक कर रो पड़ते हैं..कहतें है हम तो पाकिस्तान से लुटे पिटे आए थे..अच्छी जिंदगी की तलाश में..
यहां भी हमारे साथ देखो क्या सुलूक हुआ। 
क्या दुकाने जलवाने के लिए..गोली खाने के लिए हम यहां आए थे...
यहीं से छह किलोमीटर दूर काजी स्ट्रीट की संकरी गलियों में 67 साल के उस्मान का घर है। 
इनके 18 साल के बेटे मो. आरिफ को भी गोली मार दी गई। दंगों की खबर सुनते ही अपनी दुकान देखने गया था। 
लौटते वक्त उसे गोली लगी। पिता उस्मान कहते हैं वो हार्ट के मरीज है अब किसके कंधों का सहारा लेकर ईलाज कराने अस्पताल जाएंगे। 
1380 ई में संत हरन शाह के नाम पर बसाए गए सहारनपुर में बीते 22 सालों में इतनी बड़ी सांप्रदायिक हिंसा नहीं हुई थी।
इस दंगे ने लोगों की जान के साथ शहर के कारोबारी माहौल को भी खत्म कर दिया है। 
अकेले अंबाला रोड पर करीब 40 से 45 दुकानों को लूटने के साथ आग लगाकर खाक कर दिया गया। 
कर्प्यू में ढील के बाद जली आटो पार्टस की अपनी दुकान देखने आए श्याम बत्रा अब आग से बचे पार्टस को खोज रहे हैं। 
62 साल की उनकी पत्नी के आंसू नहीं थम रहे हैं..कहती है कि अभी जल्दी ही 80 लाख रुपए का सामान दुकान में रखवाया था। 
सब खत्म हो गया।   


विवाद क्या है

कुतुबशेर इलाके में गुरुद्वारा के बगल में 2800 गज ज़मीन को सिंह सभा ने 2001 में खरीदा था। 
इसी पर गुरुद्वारा सिंहसभा के लोग एक बैक्वेट हाल बनवा रहे थे। दरअसल साठ साल पहले ये संपत्ति शेख मोहम्मद असकरी की थी
जो पीली और एक लाल कोठी के रूप में जानी जाती थी। इसी में असकरी परिवार 535 वर्गमीटर जमीन को अपनी मस्जिद के रूप में इस्तेमाल करते थे।
चूंकि ये उनकी निजी इबादतगाह थी इसके चलते जब 1948 में उन्होंने अपनी संपत्ति का बैनामा श्रीमती मंशा देवी और राजवती को कर दिया।
लेकिन 1951 में खलील अहमद नाम के शख्श ने उच्च न्यायालय में ये कहकर आपत्ति जताई कि मस्जिद का बैनामा नहीं हो सकता है।  
लेकिन 1964 में उच्चन्यायलय ने ये कहकर खलील अहमद की आपत्ति निरस्त की दी कि यहां कोई सार्वजनिक मस्जिद नहीं थी। 
धीरे-धीरे ये विवाद ठंडे बस्ते में चला गया और वक्त के साथ पीली और लाल कोठी जर्जर हो कर गिर गई
बाद में इसी जमीन के टुकड़े को मंशा देवी के परिजनों से गुरुद्वारा कमेटी ने खरीद ली। 
लेकिन शहर काजी नदीम कहते हैं कि चूंकि यहां मस्जिद थी 
इसी के चलते 535 वर्गमीटर ज़मीन को गुरुद्वारा सभा को छोड़ना चाहिए। 

26 जुलाई रात को कैसे भड़की हिंसा

2001 में सिंह सभा ने खरीदा तब एक बार फिर से ये जमीन का टुकड़ा सुर्खियों में आ गया।
जमीन के बैनामे पर फिर से मोहर्रम अली उर्फ पप्पू ने आपत्ति लगाई। 
लेकिन जिला न्यायालय ने 15 मई 2013 को फैसला सिंह सभा के पक्ष में सुनाया। 
तब से धीरे धीरे इस जमीन पर निर्माण कराया जाता रहा है। लेकिन दिसंबर 2013 में मोहर्रम अली पप्पू की शिकायत पर 
सहारनपुर के सिटी मजिस्ट्रेट ने इस जमीन पर फिलहाल निर्माण ना कराने के निर्देश दिए थे। 
इसी 26 जुलाई को दूसरे पक्ष के लोगों को खबर मिली की रात को इस जमीन पर निर्माण कराया जा रहा है। 
ये खबर फैलते ही रात को कुतुबशेर थाने में दोनों पक्ष इकट्ठा हो गए। एक पक्ष बनवाने पर और दूसरा पक्ष गिराने पर अड़ा रहा। 
रात में पत्थरबाजी भी हुई लेकिन पुलिस ने दोनों पक्ष को फौरीतौर पर शांत कराकर भेज दिया। 
लेकिन सुबह तक दूसरे पक्ष के हजारों लोग इकट्टा हो गए। 
लोकल इंटेलीजेंस यूनिट ने प्रशासन को खबर भी दी कि माहौल बिगड़ सकता है। 
लेकिन सुबह पांच बजे से लेकर साढ़े सात बजे तक प्रशासन पर्याप्त पुलिस फोर्स का इंतजाम ही नहीं कर पाया। 
नतीजा हजारों की भीड़ ने हिंसक रुख अख्तियार कर लिया। 

जमीन पर निर्माण अवैध था
 
दरअसल सहारनपुर में गुरु्द्वारा प्रबंधक कमेटी फिलहाल भंग है। कमेटी का चुनाव भी हाल में होना है। 
इसी के चलते कुछ लोग इस जमीन के टुकड़े पर जल्द से जल्द निर्माण कराकर श्रेय लेने की होड़ में है
ताकि इसके आधार पर गुरुवद्वारा सिंह सभा का चुनाव जीता जा सके। 
वरना सिटी मजिस्ट्रेट ने जब यहां निर्माण कराने की मनाही कर रखी थी 
तब रातो रात निर्माण कराने की क्या जरूरत थी। इसकी तस्दीक सहारनपुर की डीएम संध्या तिवारी भी करती है। 
उनका कहना है कि इस निर्माण का नक्शा सहारनपुर विकास प्राधिकरण से नहीं पास है। 

कौन है मोहर्रम अली उर्फ पप्पू

सहारनपुर के दंगों में मोहर्र्म अली पप्पू का नाम सुर्खियों में है। पुलिस ने कुतुबशेर थाने में इसके खिलाफ 
बलवा भड़कांने से लेकर शांति भंग करने तक का मामला दर्ज किया है। सहारनपुर के एसएसपी राजेश कुमार पांडेय का कहना है कि 
शहर में शांति बहाल होने के बाद जल्द से जल्द इसे गिरफ्तार किया जाएगा। सहारनपुर के सांसद का आरोप है कि मोहर्ररम अली पप्पू 
कांग्रेसी नेता इमरान मसूद का सहयोगी है। मोहर्रम अली पप्पू पूर्व सभासद रह चुका है और पेशे से प्रापर्टी डीलर है। 
इनके खिलाफ पहले भी सहारनपुर के जनकपुरी, मंडी और कुतुबशेर थानों में बलवा करने से लेकर फर्जीवाड़े तक के दर्जनभर मामले दर्ज है।
गुरुद्वारा सिंहसभा का भी आरोप है कि 2001 में मोहर्रम अली पप्पू ने अपने को पर्दे के पीछे रखकर 
अब्दुल वहाब नाम के एक मजदूर शख्श से वाद दायर करवाया। इसी के चलते ये विवाद इतना बढ़ा। 
लेकिन मोहर्रम अली कहते हैं कि पुलिस राजनीतिक दबाव में काम कर रही है..मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मेरे खिलाफ 
मामला दर्ज किया गया है। 

पिछले साल उत्तर प्रदेश में हुए सांप्रदायिक हिंसा के 247 मामले हुए जिनमें 77 लोगों की मौत हो गई। 
सहारनपुर में दंगों के बाद प्रशासन अब कहता है कि इस ज़मीन के बारे में दोनों सांप्रदाय के लोगों को बुलाया जाएगा। 
दोनों के दस्तावेज मंगाए जाएंगे और एक शातपूर्ण रास्ता कानून के मुताबिक निकाला जाएगा। 
लेकिन काश यही कदम महीना भर पहले उठा लिया जाता तो इस भयानक हादसे को रोका जा सकता था।
कुछ दिन बाद पैरामिलिट्री फोर्स वापस चली जाएगी..मीडिया के कैमरे रोती आंखों का पीछा करना बंद कर देंगे। 
तब वो भरोसा सहारनपुर वासियों को एक दूसरे में जरूर खोजना पड़ेगा..जिसकी बुनियाद पर शहर धड़कता है, कारोबार चलता है।

राहत इंदौरी का शेर है..

जो जुर्म करते हैं इतने बुरे नहीं होते
सजा ना देकर अदालतें बिगाड़ देती हैं
मिलाना चाहा है इंसा को जब भी इंसा से
तो सारे काम सियासत बिगाड़ देती है