Sunday, 3 August 2014

श्रावस्ती का चुनाव

गौतम बुद्ध की नगरी श्रावस्ती के मुख्यालय भिन्गा से 40 किमी दूर सेमरहना के छोटे से गांव में टाटा फाचूर्नर से लेकर सफारी तक घूल से लस्त पस्त रंग बिरंगे झंडे लगाए घूम रही है..हां..नेताओं के पीछे तो आदमी नहीं है लेकिन इन गाड़ियों के पीछे फटी बनियान और बिना नेकर के छोटे बच्चों का हूजूम जरुर है। .आम के बगिया में गाड़ी रुकने के साथ ही धूल की एक आंधी हमारे सर से निकल गई। गांव में हल्ला हुआ..नेयता आए है बहुत बड़े गुंडे रहे हैं..इलाहाबाद के..सबसे पहले यही परिचय उनके लगुवा भगुवा नेता न...े हमारे चाचा के कान में फुसफुसाकर दिया। उनके चेहरे पर काली मूंछो का स्याह फैलावट..ओंटों पर दबंग मुस्कान..गले लगाने की नई आदत से गुलजार समाजवादी पार्टी के माफिया डॉन अतीक अहमद राजनीतिक दीक्षा लेने के लिए हमारे गांव की धूल फांक रहे हैं..यहां से 90किलो मीटर दूर बहराईच में कैसरगंज से माफिया ब्रजभूषण सिंह मुलायम सिंह का पहले नाम जप रहे थे इस बार मोदी की ताजपोसी का बहाना लेकर वोटरों को लुभाने में लगे हैं..हमारा जिला आजकल राजनीतिक कचराघर बन गया है..कैसरगंज से चार बार सांसद रह चुके बेनी प्रसाद वर्मा से लेकर निवर्तमान सांसद ब्रजभूषण सिंह ने लोगों को निराश करने के अलावा कुछ नहीं किया है। करीब 49 फीसदी साक्षरता दर वाला श्रावस्ती अति पिछड़े शहरों में आता है भारत सरकार इसे फंड भी देती है लेकिन ये फंड कहां से आता है और कहां चला जाता है कुछ पता नहीं..पिछली बार यहां से कांग्रेस के सांसद विनय कुमार पांडेय थे..क्षेत्र में जाने से ज्यादा ये टीवी डिबेट में आते थे..मेरी भी पहली मुलाकात इनसे एनडीटीवी के दफ्तर में ही हुई थी...माना जाता है कि गौतम बुद्ध ने इस शहर में 24 चतुर्मास किया था..कई एतिहासिक धरोहरे मसलन डाकू अंगुलीमार की गुफा, बौद्ध स्तूप भी है..लेकिन अतीक अहमद और रिजवान जहीर जैसे आपराधिक औजारों से लैस लोग यहां से नेता बनने की फिराक में है। ..मैं जानता हूं कि श्रावस्ती जैसे शहरों में रहने वाले सीधे मेहनती लोगों को बेवकूफ बनाकर जाति धर्म के आधार पर वोट कराना सबसे आसान है.... ये इसी पर वोट करेंगे भी।लेकिन फिर भी मेरे जैसे बाशिंदे निराश नहीं है..राहत इंदौरी का शेर हिम्मत पैदा करता है..
.खुष्क दरियाओ में हल्की सी रवानी और है, रेत के नीचे अभी थोड़ा सा पानी और है,
जो भी मिलता है उसे अपना समझ लेता हूं मैं, एक बीमारी मुझे ये खानदारी और है..

(लेखक के अपने निजी विचार है..इनका किसी पार्टी से कोई लेना देना नहीं है)

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